थामती रही हौसलों को…

औंधे मुंह जा गिरी मैं।
थामती रही हौसलों को,
फिर भी वह जा फिसली।
तब खत्म हुई जीवन आशा,
संपूर्ण अब जीवन सारा।
जा छिपी में तम शिविर में,
बस अब मिटने की आशा।
बदला कुछ पल भर में ऐसा,
जब प्रकट हुई उज्जवल आशा।
थामा कुछ ऐसे,
उसने मुझको।
ना डरी मैं, ना छुपी मैं।
सामने थी डटी मैं।
फिर पाया मैंने वो साहस,
और हौसलों का साथ।
न थी अकेली मैं,
और न गिरी मैं….

Comments

11 responses to “थामती रही हौसलों को…”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बढ़िया

  2. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. धन्यवाद मैम

  3. Deep Patel

    Very nice

  4. Anonymous

    बहोत ही मोहक मधुर रचना । अति सुंदर भाव

  5. प्रतिमा

    बहुत बहुत धन्यवाद

  6. प्रतिमा

    बहुत बहुत आभार

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