एक मां की अरदास

इक अरदास करूं तुमसे प्रभू !
मैं रो लूंगी भाग्य को अपने,
हर दुःख को चुप्पी से सह लुंगी।
बना देना मुझे निर्भया की मां,
दिल को अपने समझा लुंगी।
मगर न बनाना मुझे,
बलात्कारी की जननी,
मैं खुद को आग लगा लुंगी।

Comments

22 responses to “एक मां की अरदास”

  1. Geeta kumari

    आपने बहुत सुन्दर लिखा है प्रतिमा जी आपकी भावनाओं का सम्मान करती हूं कि एक बलात्कारी कि मां कभी नहीं बनना चाहेंगी ,किंतु भगवान से प्रार्थना है कि कोई भी औरत निर्भया की मां भी ना बने कभी भी नहीं । पूरी कोशिश रहेगी कि और निर्भया नहीं ना ही निर्भया की मां बने कोई ….OH MY GOD, PLEASE NO MORE NIRBHAYA.

    1. प्रतिमा

      बहुत बहुत आभार गीता मैम सुंदर समीक्षा के लिए
      आपकी बात से मैं बिल्कुल सहमत हूं ,
      बहुत ही बुरा लगता है जब जब ऐसी संवेदनशील एवं क्रुर घटनाएं
      हमारे देश में घटित होती है ,हृदय भर आता है

  2. Priyanka Kohli

    Nice

    1. प्रतिमा

      Thank you

  3. बहुत सुंदर विचार है आपका

    1. प्रतिमा

      धन्यवाद सर

  4. Neetu Mishra

    Sabdon k moti kaafi aakarshak hai

  5. प्रतिमा

    Thank you

  6. Aditya Kumar

    अति मार्मिक। निशब्द

    1. हार्दिक धन्यवाद

  7. मोहन सिंह मानुष Avatar

    बहुत ही उम्दा रचना
    मार्मिक भाव

  8. akash choudhary

    Nice lines

  9. Anonymous

    बहोत ही सुंदर कविता लिखी है आपने यह.👍

  10. अत्यन्त मार्मिक

    1. प्रतिमा चौधरी

      Thank you Suman ji

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