जरा चिंगारियों के वास्ते

न रखना आंख अपनी तुम
इस तरह से सदा ही नम
जरा चिंगारियों के वास्ते
स्थान भी रखना।
किसी की बात कोई सी
न आये आपके यदि मन
उसे इग्नोर कर देना
मगर अपमान मत करना।

Comments

7 responses to “जरा चिंगारियों के वास्ते”

  1. harish pandey

    बहुत ही सुंदर कविता, वाह वाह

  2. बहुत खूब वाह

  3. Geeta kumari

    बहुत सुंदर भाव , कवि सतीश जी ने किसी का भी अपमान ना करने की बहुत ही सुंदर सलाह दी है । बहुत ज्ञान वर्धक रचना

  4. वाह वाह बहुत खूब सर

  5. Harish Joshi

    बहुत ही सुन्दर।👌👌

  6. Saurav Tiwari

    👌👌bhut sundar

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