बारिश की बूंदें
पड़ने लगी हैं,
ठंडी हवाएं
चलने लगी हैं।
सड़कों में बैठे हुए
बेघरों की
जीवन की साँसें
थमने लगी हैं।
समाचार पत्रों में
छपने लगा है
ठंडक से मौतें
होने लगी हैं।
देखो क्या ?
मानव तमद्दुन की बातें
सचमुच बुलंदी
छूने लगी हैं।
जो भी है फिर भी
धरातल में देखो
ठंडक से मौतें
होने लगी हैं।
ठंडी हवाएं
Comments
4 responses to “ठंडी हवाएं”
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“ठंडी हवाएं चलने लगी हैं। सड़कों में बैठे हुए बेघरों की
जीवन की साँसें थमने लगी हैं।”
सड़कों पर बैठे हुए बेघर लोगों की ठंड में हुई दुर्दशा का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई कवि सतीश जी की बेहद मार्मिक रचना। हृदय स्पर्शी पंक्तियां -

कमाल का चित्रण
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बहुत खूब
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बहुत बेहतरीन कविता
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