गांव वीरान हो गए
छोड़कर वे मनोरम वादियां
शहर की ओर चल दिये,
फिर नहीं लौट पाये वापस
शहर में भीड़ थी
वे भीड़ में समा गये।
उधर वे खो गए
इधर गांव के आंगन के
पत्थर तक रो दिए।
खेत-खलिहान
में झाड़ियां उग गईं,
उनकी यादें धीरे-धीरे मिट गईं।
पलायन
Comments
4 responses to “पलायन”
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बहुत सच्ची बात, सुन्दर पंक्तियाँ
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ऐसा ही हो रहा है, सुन्दर लिखा है।
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अतिसुंदर रचना
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गांव से शहर पलायन करते हुए युवा वर्ग पर यथार्थ चित्रण किया है अपनी कविता में, कवि सतीश जी ने गांव में पीछे छूटे लोगों की वेदना का भी जिक्र किया है कविता में, अतिशयोक्ति अलंकार का सुंदर प्रयोग
“इधर गांव के आंगन पत्थर तक रो दिए।
खेत-खलिहान में झाड़ियां उग गईं,”
यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई सुंदर कविता
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