रहस्य ही रह जाता है

जिंदगी का पल पल
बीत जाता है,
हम देखते रह जाते हैं,
सुबह से शाम तक
शाम से सुबह तक
मिलन से विरह तक,
बीते पलों की जिरह तक
नहीं कर पाते हैं,
कल से आशा लगाये
रह जाते हैं।
मगर विश्वास नहीं
कर पाते हैं।
कल भी बीतेगा,
बीतता जायेगा,
बीतता रहा है।
कभी नादान थे
अंजान थे,
वो भी बीत गया।
आज भी बीतेगा
कल भी।
मकसद आखिर क्या है
बीतने का।
बीतना ही है तो
फिर मकसद क्या है
होने का।
यह रहस्य
रहस्य ही रह जाता है।
वक्त बीतता ही जाता है,
बीत जाता है।

Comments

3 responses to “रहस्य ही रह जाता है”

  1. Geeta kumari

    यह रहस्य
    रहस्य ही रह जाता है।
    वक्त बीतता ही जाता है,
    बीत जाता है।
    __________ जीवन के सत्य को परिलक्षित करती हुई जीवन के रहस्य को चित्रित करती बहुत ही सुंदर रचना खूबसूरत शिल्प के साथ अति उत्तम भाव का सुंदर समन्वय स्थापित करते हुए कवि सतीश जी की , अति उत्तम एवं रोचक रचना। उम्दा लेखन

  2. बहुत सुंदर रचना

  3. Deepa Sharma

    बहुत सुंदर कविता

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