दुर्योधन कब मिट पाया :भाग :40

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अति शक्ति संचय कर ,
दुर्योधन ने  हाथ बढ़ाया,
कटे हुए नर मस्तक थे जो ,
उनको हाथ दबाया।
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शुष्क कोई पीपल के पत्तों
जैसे टूट पड़े थे वो,
पांडव के सर हो सकते ना
ऐसे फुट पड़े थे जो ।
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दुर्योधन के मन में क्षण को
जो थी थोड़ी आस जगी,
मरने मरने को हतभागी
था किंचित जो श्वांस फली।
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धुल धूसरित हुए थे सारे,
स्वप्न दृश ज्यो दृश्य जगे  ,
शंका के अंधियारे बादल
आ आके थे फले फुले।
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माना भीम नहीं था ऐसा
मेरे मन को वो भाये ,
और नहीं खुद पे मैं उसके,
पड़ने देता था साए।
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माना उसकी मात्र प्रतीति 
मन को मेरे जलाती थी,
देख देख ना सो पाता था 
दर्पोंन्नत जो छाती थी।
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पर उसके घन तन के बल से,
है परिचय कुछ मैं मानू,
इतनी बार लड़ा हूँ उससे
थोड़ा सा तो पहचानू।
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क्या भीम का सर ऐसे भी
हो सकता इतना कोमल?
और पार्थ ये हारा कैसे,
मचा हुआ हो अयोमल?
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अश्वत्थामा मित्र तुम्हारी
शक्ति अजय का  ज्ञान मुझे,
जो कुछ भी तुम कर सकते हो
उसका है अभिमान मुझे।
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पर युद्धिष्ठिर और नकुल है 
वासुदेव के रक्षण में,
किस भांति तुम जीत गए
जीवन के उनके भक्षण में?
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तिमिर  घोर  अंधेरा  छाया 
निश्चित कोई  भूल हुई है,
निश्चय  हीं किस्मत  में मेरे
धँसी हुई सी  शूल हुई है।
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दीर्घ स्वांस लेकर दुर्योधन
हौले से फिर डोला,
चूक हुई है द्रोणपुत्र,
निज भाग्य मंद है बोला।
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अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित
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