सपनों की धूप में
हम अपनी चादर सुखा रहे थे
तेरे दिखाये हुए रास्ते में हम
फूल बिछा रहे थे
तेरी बेचैनी बढ़ गई थी कितनी
जब हम मोतियों से बाल सजा रहे थे
उतार के फेंक दी मैने वो पायल
जो तुम सौतन के पैरों से उतार कर ला रहे थे
मुझे तो पहचानने तक से इनकार
कर दिया तुमने और हम
तुम्हें जान से भी ज्यादा चाह रहे थे
एक बूँद ही बरसा दी होती प्यार की हम पर
हम बेवजह ही अश्कों से तकिया भिगा रहे थे।
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