Pragya Shukla, Author at Saavan's Posts

“बालू का ढेर”

ख्वाहिशों की बदलियां छटने लगी हैं आजकल मुहब्बत की रेत फिसलने लगी है आजकल काजल आँखों का दुश्मन बन बैठा है मेहंदी से भी अब कोई कहाँ नाम लिखता है दिल की किताब के सारे पन्ने फट गये हैं यूँ किसी भी तरह से ना कोई पन्ना जुड़ता है बालू के ढेर पर बैठी हूँ आशियां बनाने समुंदर में अब कहाँ कोई ज्वार उठता है ले जाएगा बहाकर एक रोज़ कोई समुंदर में बहाकर ये खयाल आजकल बार-बार उठता है… »

प्रवासी मजदूर का वेश..

जा रहा हूँ आज फिर परदेश जहाँ से आया था धर प्रवासी मजदूर का वेश छोंड़ी थी जो गलियां यह सोंचकर मैंने के कभी ना लौटकर अब आऊंगा घर की बची रूखी-सूखी ही खाऊंगा जब नहीं मिला गांव में काम और जेब में फूटी कौड़ी तो निकल पड़ा छोंड़ पत्नी और मौड़ी मौड़ी का ब्याह इसी साल करना है मौड़े का घर भी तो बसाना है पत्नी की बीमारी का इलाज कराकर ताउम्र उसी संग रहना है जिम्मेदारियां निभाते हुए अगर जिंदा लौट आया काल का ग्र... »

आज भी माँ की गोद में..

आज भी माँ की गोद में सिर रखकर सो लेता हूँ होता हूँ उदास कभी तो लिपटकर रो लेता हूँ माँ को गुजरे जमाने हुए हैं मगर मैं आज भी माँ से मिलकर प्यार बटोर लेता हूँ… »

मन के कोंण*******

************* हे आराध्य प्रेम ! आज मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ क्योंकि तुम ही हो जिसने मुझे जैविक से सामाजिक प्राणी बनाया मेरे अन्तस में भाव स्फुटित हुए मन के कोंण रोम-रोम को सहला बैठे बंजर धरती पर पुष्प खिल उठे और मेरे अंतर्मन में किसलय निकलते लगे तुम्हारे ओज के आलोक से मैं रति समान मनमोहिनी बनी तुम्हारे आगमन से ही मैं परिपूर्ण हुई मेरे अंतस में कविताओं का संगम भी तुम्हीं से हुआ मैं राधा भी तुम्ह... »

हे हिमाद्रि…!!

हे हिमाद्रि ! सदियों से जब मैं नहीं थी तब भी तुम यूँ ही अडिग खड़े थे और आज भी एक इंच तक ना हटे भारत का शीर्ष मुकुट बनकर खड़े हो तुम गंगा को बहाकर तुम हम सबका उद्धार करते हो ना जाने कितनी औषधियों को उपजाकर तुम प्रतिवर्ष, प्रतिफल देते हो.. विनाशकारी ओलावृत्तियों भूकंप और तूफान में भी तुम जरा भी ना घबराये बर्फ की चादर ओढ़ कर तुमने धूप का आलोक बढ़ाया पंक्षियों, वृक्षों को अपने अंक में सुलाया… अप... »

कब तलक

कब तलक निगाहें यूँ चुराओगे है यकीन एक दिन तो पास आओगे.. »

“मेरी मुस्कान पर ना जाओ दोस्तों”

मेरे होंठों की मुस्कान पर ना जाओ दोस्तों! ये तो मेरे यार की तरह फरेबी है! मेरे आँसू हैं मेरी असली पहचान जो बंद कमरे निकलते हैं कभी तकिये से आकर पूँछों हम उसे कितना भिगोते हैं!! सिसकियाँ सुन-सुनकर मेरे कमरे की दीवारों में दरारे आ गई हैं तन्हाई से पूँछों हम कितनी बातें करते हैं चाँद देखते हुए गुजार देते हैं रातें जुगनू पकड़कर हम मुठ्ठियों में बंद करते हैं सितारों से पूँछों कभी हम उन्हें कितनी बार गि... »

कलम भी रो पड़ी…

मेरे जीवन की कहानी दुःख ही रही आखिर क्या लिखूँ आज जो अभी तक मैंने लिखा नहीं… विधाता ने मेरे भाग्य में आँसुओं के सिवा कुछ भी लिखा नहीं… मेरे पतझड़ समान जीवन पर बरसात हमेंशा बनी रहती है हर पल नैन बरसते रहते हैं… मेरी व्यथा से सारे पन्ने भर गये कलम भी बेबस होकर रोने लगी इतना दर्द था मेरे एक-एक लफ्ज में…!! »

पिछली बरसातों में

खोखलापन है तुम्हारी बातों में अब ना रही तेरे लिए मेरे दिल में वो जगह ! जो हुआ करती थी पिछली बरसातों में.. »

कविता में भाव

वो कहते हैं तुम्हारी कविता में भाव नहीं हैं मैं क्या जवाब दूं जब दिल ही नहीं हैं !! »

आईने ने कहा….

कल रात मैंने अपने आईने से कहा- आजकल मैं बहुत अच्छा लिखने लगी हूँ सब कहते हैं.. आईने ने कहा दिल जो टूट गया ना !! »

“कलम में स्याही”

कबूतर को भेजूं अब वो जमाना नहीं रहा खुद जाकर मिलूं यह सम्भव नहीं रहा कितने खत लिखे हैं उसके लिए मैंने डाकिया कहता है खत का जमाना नहीं रहा कलम में स्याही नहीं बची इतने खत लिखे मैंने ऱखने के लिए उनको कोई ठिकाना नहीं रहा किस पते पर भेजूं मैं डाकिए को वो तो मुझ में ही समा गया अब उसका अलग पता नहीं रहा.. »

इश्क आँच पर पकता रहा…

यूँ ही सिलसिला चलता रहा कभी मैं कभी वो रूठता रहा टूटने लगे दिल बेतहाशा मगर इश्क आँच पर पकता रहा.. »

बालश्रम:- “गरीबी का थप्पड़”

दूध के दाँत पालने में ही टूट गये गरीबी का थप्पड़ इतनी जोर से पड़ा लाद दी जिम्मेदारी की पोटली कंधों पर बचपन के खिलौने पल में टूट गये थमा दी चाय की केतली जब मुझे तब जानी मैंने शिक्षा की कीमत जिन्दगी की आड़ी-सीधी रेखाएं यूँ खिंच गईं माजते-माजते ढाबे के बर्तन कोमल हथेलियां वयस्क हो गईं जरूरी नहीं चाय बेंचने वाला हर प्राणी राजा बन जाए ! बालश्रम बचपन को लील जाता है गरीबी का थप्पड़ जब जोर से पड़ता है.. »

आत्मनिर्भर बन

शिक्षा की खदानें बंद करो डिग्री बेचने वाली दुकानें बंद करो छात्रों को डालो जेलों में शिक्षकों की तनख्वाहें बंद करो ना लूटो हमको शिक्षा के नाम से ज़रा डरो राम के नाम से व्यापार मत करो तुम ज्ञान की वृद्धि पर कंधर पड़े हैं तुम्हारी बुद्धि पर जब शिक्षा का कोई अर्थ नहीं तो हम समय करेंगे व्यर्थ नहीं लगाएंगे चाय और पकौड़े की दुकान आत्मनिर्भर बन हो जाएंगे महान। »

एक फूल दो माली***

करुण रस की कविता:- ***************** जिसने हमको प्यार किया मेरी राह में सुबहो से शाम किया ना कद्र की हमनें एक पल भी उसकी अपशब्दों का उस पर वार किया एक रोज़ मैं बैठी थी अपने प्रिय के साथ जहाँ आ पहुँचा लेकर वो पागल फूल वहाँ मैं अपने प्रिय की संगिनी थी प्रेम में मेरे निष्ठा थी मैं बोली उठ चल ओ पगले ! तेरा मेरा कोई मेल नहीं प्यार मोहब्बत एक इबादत है बच्चों का कोई खेल नहीं वह सुनता रहा चुपचाप खड़ा मेरे प... »

गिले-शिकवे

गिले-शिकवे जरा कम कर दिये हमनें जब से वो दूजी गली जाने लगे वो हमसे दूर रहकर खुश रहेंगे इसलिए हम ये दुनिया छोड़ आज जाने लगे।। »

हिंदी गंगाजल है ।।

रोम-रोम में बसी हमारे हिंदी राजभाषा है बन जाए यह राष्ट्रभाषा इस जीवन की यह आशा है हिंदी है परिपक्व, परिपूर्ण हिंदी ही ममता-सी निर्मल है हिंदी है लहू में अपने हिंदी ही कण-कण में मिश्रित है हिंदी मां के आंचल में है हिंदी ही गंगाजल है हिंदी है कवि के मन की पीड़ा हिंदी ही शब्द-सागर है हिंदी है संस्कृत की बेटी हिंदी ही प्रज्ञा की जननी है हिंदी है सबसे सरल, मनोरम हिंदी ही उर्दू की भगिनी है।। »

“आओ मनाएं हिंदी दिवस”

हिंदी दिवस:- चौदह दिसंबर को हर वर्ष हिंदी दिवस मनाया जाता है उसी दिन क्यों हिंदी को सम्मान दिलाया जाता है हिंदी तो ऐसे ही वाणी है जो भारतीय परंपरा पर चलती है देशी हो या विदेशी हर भाषा को आत्मसात करती है देवनागरी लिपि की शोभा हिंदी ही बढ़ाती है भारत माता के माथे की स्वर्णिम बिंदी मानी जाती है यह कवियों की निज वाणी है इसे समझता भारत का हर प्राणी है भारत के संविधान में राजभाषा से सम्मानित है फिर क्यो... »

टूटा हुआ दिल

अभिव्यक्ति ह्रदय से:- +++++++++++++ आज तोड़ दिया तुमने मेरा टूटा हुआ दिल ! ऐसा लग रहा है जैसे सीने पर एक पत्थर-सा रखा है मेरे। एक तुम ही थे जिससे थोड़ी बहुत उम्मीदें लगा रखी थीं मैंने ! तुमने भी मुंह मोड़कर मुझे मुंह के बल गिरा दिया।। »

किताबों के दिन !!

कहाँ रहे अब किताबों के दिन !! अब तो बस अलमारी में रखी हुई किताबें धूल खाया करती हैं गुजरती हूं जब कभी उनके करीब से तो मुझे बड़ी उम्मीद से देखती हैं कि शायद आज मैं उन्हें स्पर्श करूंगी, उठाऊंगी, खोलूंगी, पढूँगी और झाड़ूगी उनके ऊपर से धूल की परतें ! जो न जाने कब से जमी हैं और जब मैं मुंह मोड़कर चल देती हूँ तो वह ना-उम्मीद उठती हैं।। »

धूप तो रहेगी।

मैंने बड़े प्यार से पूछा आज उससे अगर मैं ना रहूं तो मेरी कमी तुम्हें खलेगी ? उसनें जवाब दिया- बादल चाहे जितने हों पर धूप तो रहेगी। »

सजा मेरी

प्यार करना थी खता मेरी बता तो देते क्या थी सजा मेरी… »

ख्वाइशों के पन्ने !!

बेजान है ये जिस्म मेरा लफ्ज भी लड़खड़ा रहे हैं भाव हैं बिखरे हुए हम सिमट ना पा रहे हैं ख्वाहिशों के पन्ने भीगे हैं अश्कों से मेरे बोलना बहुत कुछ चाहते हैं पर कुछ भी कह ना पा रहे हैं !! »

हीरे जड़ी अंगूठी *****

❤❤ अभिव्यक्ति दिल से ❤❤ *************************** पहली मुलाकात और पहली भेंट आज भी याद है मुझे… वह बरगद के नीचे बैठकर करी थी जो बातें हमने दिल आज भी बेताब है… तुम कुछ लाए थे मेरे लिए बड़े प्यार से दोनों घुटने टेककर मेरे सामने बैठे थे और एक अंगूठी निकालकर तुमने शिद्दत से मुझे पहनाई वो हीरे जड़ी अंगूठी मुझे बहुत भायी… वो अंगूठी आज तक मैंने नहीं उतारी मेरे हाथों की खूबसूरती आज भी ब... »

नए युग का सूत्रपात

चल साथी चल करें हम नये युग का सूत्रपात बढ़ चलें नवीन पथ पर हाथों में लेकर हाथ ना जाति-पांति के बंधन हों ना मरी हुई संवेदनाएँ ना लाशों के ढेर लगे हों ना आगे बढ़ने की आपाधापी हों स्वर्णिम स्वप्न और हों प्रेम के प्यारे बंधन हाथ बढ़ाकर सब सहयोग करें थके ना फिर कोई यौवन ना हो व्यथा ना कोई व्यथित हो सबके मन में प्रेम फलित हो।। »

भ्रूण हत्या

मेरा जिससे था प्रेम प्रसंग वो रहता था हर पल मेरे संग हम एक दूजे के साये थे जन्मों बाद करीब आए थे.. वो हाथों में हाथ लिए बैठा था बोला मुझसे विवाह रचा लो मुझको अपना पति बना लो मैं बोली विधाता को मंजूर नहीं घर वालों को करूंगी मजबूर नहीं तुम प्रेम हो मेरा यह तय है तेरे दिल में ही मेरा घर है पर भ्रूण हत्या का पाप मुझसे ना हो पाएगा तेरे वियोग में ही प्रियतम मेरा यह जीवन जाएगा वह चौंका उठकर खड़ा हुआ कैसी... »

सीता-राम की प्रथम भेंट

सीता वियोग में बहुत विकल थे प्रज्ञा के श्रीराम ! एकाएक याद हो आई सिय से प्रथम मिलन की बेला !! ज्यों घोर तिमिर में कौंध उठी हो अकस्मात दामिनी त्यों राम हृदय में जगमगा उठी सीता से जनक वाटिका में हुई प्रथम भेंट लता-कुंजों की ओट से सीता-राम दोंनो एक दूजे को निष्पलक देख रहे थे.. फिर संकोचवश नेत्र संगोपन करने लगे नेत्र निमीलन और उन्मीलन की इस प्रक्रिया से कोयल कूँकने लगती हैं मकरन्द बिखरने लगते हैं आकाश... »

नींद हरजाई..!!

एक सवाल पूंछना है तुमसे एक बार आकर तो मिलो सब कुछ तो ठीक हो गया है तुम्हारे जाने के बाद… पर नींद कहाँ गुम हो गई यही पूंछना है मुझे रातें चाँद, तारे देखकर और नगमें सुनकर बिता देती हूँ ख्वाबों को छत पर सुला देती हूँ… खिड़कियां खोल के रखती हूँ शाम से अपनी कल्पनाओं से भी आँख चुरा लेती हूँ… बिस्तर रेशम का बिछा रख्खा है माँ को भी बाहर सुला रख्खा है शोर ना करना जरा भी मेरे कमरे के आस-पा... »

दादी माँ की बरसी

आंगन में एक पाटा रखकर पण्डित और परिचितों को बुलाकर लगा तैयारी में पूरा घर पकवान और मिष्ठान बनाकर हाथ जोड़कर सब बैठे हैं दादी की बरसी है आज एक बरस होने को आया पर दादी को कोई भूल ना पाया लगता है जैसे कल की ही बात हो दादी बैठी थी आंगन में कुछ हँसकर बोल रही थी अपनी पोटलियां टटोल रही थी मैं लेकर चाय गई दादी के पास उन्होनें दिया था आशीर्वाद कुछ बातें उनकी आज जब मन करता है सुन लेती हूँ उनकी आवाज रिकार्ड ... »

बेटी:- दो कुल का अभिमान

होंठों की मुस्कान है बेटी सबके घर की शान है बेटी बेटा तो है कुल का दीपक दो कुल का अभिमान है बेटी.. »

चाय की तरह

मैंने कोई मौसम नहीं देखा ! मैंने तुम्हें चाहा है चाय की तरह !! »

बेखुदी

बेखुदी में जो उठ गये थे कदम तेरी बेवफाई याद आते ही खुद-ब-खुद रूक गये… »

बेतहाशा मोहब्बत

वो आज भी मुझे बेतहाशा मोहब्बत करता है, यकीन नहीं है मगर दिल को यही लगता है.. »

सावन की लगन…

ऐसी लागी लगन सावन की मुझे, मैं तो घड़ी-घड़ी कविता बनाने लगी.. कभी सोते हुए कभी जगते हुए, बेखयाली में कुछ गुनगुनाने लगी.. गजलों में मगन, नज्म़ों में मगन, कल्पनाओं में दुनियां बसाने लगी.. छोंड़ा मैंने उसे प्यार करती थी जिसे, सावन को मोहब्बत जताने लगी.. ओ कवियों! मुझे उन्माद तो नहीं, बेवजह आज कल मुस्कुराने लगी.. »

टूटते गुलाब !!

आज तोड़ दी मैंने पीली पत्तियां पौधों से उसी तरह जैसे मैं दिल से बेदखल हुई थी तुम्हारे ! हरी पत्तियों पर जब पड़ती हैं ओस की बूंदें तो तुम्हारे होंठों पर टूटते गुलाब याद आते हैं… हरी-हरी घास को जब कंघी करती ये हवाएं हैं तो याद आ जाता है वो हसीं लम्हा जब तुम गेसुओं में मेरी अपनी उंगलियां फेर देते थे आज तोड़ दी मैंने वो पीली पत्तियां पौधों से अब सिर्फ हरी-भरी पत्तियां ही रह गई हैं !! »

गुजार दी जिन्दगी..

गुजार दी मैंने जिन्दगी बस इन्तजार में तुम आकर सम्भाल लोगे मुझे टूटते हुए.. »

यादें..

तुम्हारा और मेरा हाल एक जैसा ही है, तुम्हें गैरों से फुर्सत नहीं हमें तुम्हारी यादों से… »

ख्वाहिशें !!!

ख्वाहिशें थी तुम्हें पाने की साहब ! पर बदनामी के सिवा कुछ ना हाथ आया.. »

आरक्षण…

क्या है आरक्षण और क्यों है आरक्षण ? क्यों हमें जाति के नाम पर अलग करते हो ? जब देखो तब हम युवाओं का बँटवारा करते रहते हो.. सवर्ण के हों इतने नंबर तब ही आगे बढ़ पाएगा, उससे कम नंबर वाला कुर्सी पर इठलाएगा.. सोंचो कभी बीमार पड़ो तो किससे इलाज करवाओगे ! जो हो मेरिट वाला या आरक्षण वाले से चीर-फाड़ करवाओगे ? तब तो तुम देखोगे नेताजी! जो हो सबसे पढ़ा-लिखा उसी डॉक्टर से इलाज करवाओगे, यदि हुई गम्भीर बीमारी ... »

लॉकडाउन

कोरोना में लगा हुआ लॉकडाउन तो हट गया मेरी जिंदगी तो लॉकडाउन में ही बसर करती है.. »

खुशबू नहीं रही

मुझे मिटाकर कहता है वो तुम पहले जैसी नहीं रही, फकत शक्ल ही बची है खुशबू नहीं रही… »

बनूँ मैं जानकी तेरी..!!

तू मेरी नज्म़ बन जाए मैं तेरी नज्म़ बन जाऊं तू मेरा राग बन जाए मैं तेरा राग बन जाऊं कुछ इस तरह जुड़ जाएं अलग ना कर सके कोई तू मेरी रूह बन जाए मैं तेरी रूह बन जाऊं ना शबरी हूँ ना अहिल्या हूँ ना शूर्पनखा-सी हूँ कामुक बनूँ मैं जानकी तेरी तू मेरा राम हो जाए…!! »

बनूँ मैं जानकी तेरी..!!

तू मेरी नज्म़ बन जाए मैं तेरी नज्म़ बन जाऊं तू मेरा राग बन जाए मैं तेरा राग बन जाऊं कुछ इस तरह जुड़ जाएं अलग ना कर सके कोई तू मेरी रूह बन जाए मैं तेरी रूह बन जाए ना शबरी हूँ ना अहिल्या हूँ ना शूर्पनखा-सी हूँ कामुक बनूँ मैं जानकी तेरी तू मेरा राम हो जाए…!! »

कितनी पी लेते हो !!

कितनी पी लेते हो जो होश नहीं रहता है जमाना तुम्हें शराबी कहके हँसता है… इतना धुत हो जाते हो कि कुछ भी याद नहीं रहता है! किसे क्या कहते हो कुछ होश तुम्हें रहता है… पीटते बच्चों को हो नशे में तुम दुःखी करते हो अपनी पत्नी को तुम… छोंड़ते कहाँ हो तुम पुरखों तक को हो गली के गीदड़ बनते शेर हो तुम… लाज आती ना तुमको करनी पर अपनी ताव देते हो तुम मूँछों पर अपनी… कहाँ की है यह म... »

गीत, गज़लें लिख रही हूँ..

गीत, गज़लें लिख रही हूँ कुछ अलग ही दिख रही हूँ होंठों पर हैं लफ्ज अटके मन ही मन में पिस रही हूँ आ गई अब शाम, दिन की दोपहर ही लग रही हूँ गुनगुनी-सी देह है और ठण्डी-ठण्डी रात है नींद है भटकी हुई सी सिमटी-सिमटी लग रही हूँ कुछ अलग ही दिख रही हूँ.. »

भाईदूज की मिठाई..!!

अपने भाई दूज की तुमको खिला मिठाई आँखों में थी हया ग्लास पानी का लाई… तुम तिरछी नज़रों से मुझको यूँ देख रहे थे मन ही मन में कितने लड्डू फूट रहे थे… ना तुम बोले ना हम बोले दोनों में यूँ लाज भरी थी कुछ मजबूरी भी थी क्योंकि घरवाले भी देख रहे थे… मैं बोली इसी लायक हो तुम भाई दूज की खाओ मिठाई तुमने कितनी तैश में मुझको प्लेट घुमाई… तब तक पीछे से आ धमकीं मेरी भौजाई तुम फिर से खाने ... »

मुझको सो जाने दो जीवन !!

मुझको सो जाने दो जीवन रात हुई अब बहुत घनी नैनों से ओझल हैं सपनें साँसों से भी ठनी-ठनी आसमान बाँहें फैलाकर मेरे स्वागत को आतुर है धरती पर बस बोझ बनी हूँ मिट्टी में मिल जाने दो रो-रोकर धो दिए दाग हैं मैंने सूखे अश्कों के ओ तकिये ! मेरे आँसू पोंछो तन्हाई मुझको जाने दो !! मुझको सो जाने दो जीवन मिट्टी में मिल जाने दो || »

निराली दुनिया..

बहुत निराली है ये दुनिया प्रज्ञा ! यादों की बात तो करती है पर याद नहीं करती… »

जब से अलग लिखनें लगे..

जब से अलग लिखने लगे हम सस्ते में बिकने लगे मौजें अलग होने लगीं पंख भी गिरने लगे बहरूपिया मन मोहकर बन बैठा है मेरा पिया हिय को अलग ना कर सके सपनें जुदा होने लगे स्पर्श जब उनका मिला एक पुष्प-सा मन में खिला ना रह गए हम पहले से बस कुछ अलग दिखने लगे कल्पना की चाबियां खो गईं हमसे अभी पैर भी टिकते नहीं अब हाथ भी हिलने लगे यहीं तक सफर था अपना जा रही हूँ लौटकर पहले दुःखता था हृदय अब छाले भी दुःखने लगे !! »

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