दो कदम

मौसीकी चौराहे पर
रखकर
आँखें बंद कर
दो कदम रोज़ चलते हैं।
हाथ में बसता और सीने
में दिल रखकर
दो कदम रोज़ चलते हैं।
म़जिले डुडते डुडते
अकसर
नई राहे मिलती है
जब दीवानगी हटाकर
और कंधे पर मजबुरिया
रखकर
दो कदम रोज़ चलते हैं।
सरद हवाएँ और गरम
चाय की पयाली पीकर
साँस हाथ में लेकर
दो कदम रोज़ चलते हैं।
हैरानगी से भरी
“ज़िन्दगी
दुख से सींचती हुई
नज़दीकीया
खुद से दूर रखकर
दो कदम रोज़ चलते हैं।
हमारी जिंदगी अब हमें
क्या दिखाऐगी,
हम अनजान है,
कयोंकी हम तो सब
जानकर भी,
दो कदम रोज़ चलते हैं।
– प्रेरणा कौल।

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

अपहरण

” अपहरण “हाथों में तख्ती, गाड़ी पर लाउडस्पीकर, हट्टे -कट्टे, मोटे -पतले, नर- नारी, नौजवानों- बूढ़े लोगों  की भीड़, कुछ पैदल और कुछ दो पहिया वाहन…

Responses

New Report

Close