ओ चन्द्रमा !

हाय ओ चन्द्रमा ! तू है कितना खूबसूरत ,
समाई है तुझमें जाने कितने हज़ारों की मूरत।
रौशनी तेरी जगती है मुझे सारी रात ,
तेरी इस आभा ने दी है नरलोक को मात।

चकोर बना छोड़ा है तूने मुझे ,
ओह ! प्रेम-जाल में फंसा रखा है मुझे।
मैं तेरी ओर ही क्यों ऐसी खींचती हूँ ?
जाने क्यूं तेरी ऊपर यूँ कविता रचती हूँ ?

जा ! तेरे इस माया जाल में मैं नहीं आती,
अरे ! ऐसे घाटे का सौदा मैं क्यों खाती ?
कृष्ण का खिलौना ही तो है तू ,
फिर किस घमंड रस में है तू ?

तेरे झांसे में मैं नहीं आयूँगी,
और जो तू नहीं माना तो सबक भी सिखाऊंगी।
अरे ऐसे चाँद से क्या प्रेम जो काली घटा से ही डर जाए?
जा कर पीछे बिजली के डर से छिप जाए।

अरे तू तो निरा खिलौना है।
और मेरे पास तो सोना है।
चाँदी की चमक के पीछे मैं क्यूं भागूं ?
रात रात भर मैं क्यों जागूँ ?

फिर भी ऐ चन्द्रमा , चल तुझपर दया करी
अर्धरात्रि आभा में तेरी मैंने सुबह करी।
हाँ ! मैं तुझपर दिल हर गयी ,
हाँ ! मैं चकोर की भाँती तेरी कांति में जाग गयी।

Comments

4 responses to “ओ चन्द्रमा !”

  1. अति सुन्दर काव्य। इस उत्कृष्ट श्रेणी के काव्य के लिए आपको मेरा नमन है।

  2. Very Nice
    All the best for your future poetries.

  3. मनमोहक कविता

  4. चन्द्रमा की चांदनी यूँही बानी रहे।

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