Papa ki chaya mein

अपनी इच्छाओं को दबाते चले गए
मेरे सपनो को अपना बनाते चले गए
मुझे कभी अहसास भी नही कराया
कि वो अपने ख्वाब छुपाते चले गए

मेरे ख्वाबों को पंख दिए
उड़ने के नए रंग दिए
रूठी कभी तो मनाया भी
नींद न आई तो सुलाया भी

कठिनाइयों में हाथ कभी छोड़ा नही
मुश्किलों में साथ कभी तोड़ा नही
डरी तो गले से लगाया आपने
मुझे पसंद नही कहके, खिलाया आपने

मम्मी की डांट से बचाया भी है
पर अपनी मीठी डांट से समझाया भी है
डर लगता है आपके आसुओं से
आखिर कार दुनिया से बचाया भी है

Comments

One response to “Papa ki chaya mein”

  1. Ankita Maurya

    आपकी कविता छी है, मगर इसमें कहीं पर भी आपने ( , ) और ( । ) का प्रयोग नहीं किया। इसके अलावा, अपने “नहीं” में ( ं ) और पर ( ँ ) भी नहीं इस्तेमाल किया है. आप अपनी कविता लिखने की कला को खराब वर्तनी और व्याकरण से दूषित कर रही हैं.

Leave a Reply

New Report

Close