शोले से जलते जिगर

शोले से जलते जिगर¹, जुगनू से टिमटिमाने लगे,
तूफ़ान भी अब यहाँ, झोंके हवा के खाने लगे।

तेग़-ए-पुश्त² शायद हो गई है गायब उनकी,
जो जुनूनी शजर³ सारे, सर आज झुकाने लगे।

हार गई ये ज़िंदगी बिन लड़े ही, देखो तो ज़रा,
लोहे के हथियार फिर से यहाँ जंग खाने लगे।

लो अब मैं भी तैयार हूँ दफ़न होने ख़ाक4 में,
मुर्दे होकर खड़े जिंदगियों को दफ़नाने लगे।

बिक रही है ज़िंदगी मासिक किस्तों पे यहाँ,
हसरतों को ज़रूरतों के हाथ बिकवाने लगे।

हर तरफ़ फैली हुई है बदनसीबी ख़ाक-सी,
ग़म को अपने भूल, आँसू भी मुस्कुराने लगे।

 

1. दिल; 2. रीढ़ की हड्डी; 3. पेड़।

 

यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना

Comments

Leave a Reply

New Report

Close