सख़्त मग़रूर 1 चश्म 2 में ज़रा इंतज़ार तो हो
इश्क़ उनके लिए भी ज़रा दुस्वार3 तो हो।
बता दे अपनी हक़ीक़त जल्दी ही हम क्यों,
जगते ख़्वाबों से तेरे चश्म ज़रा बेदार4 तो हो।
इक ज़माने से तुमसे मिली नहीं नज़रे हमारी,
कभी सूने दरीचे5 में तुम्हारा ज़रा दीदार तो हो।
देने को दे देंगे हम, सारा जहाँ अपना तुम्हे,
लेकिन इसकी तुमको ज़रा दरकार6 तो हो।
समझ लेंगे जुनून-ए-इश्क़ आया कुछ काम,
तुम्हारी आँखों में इसका ज़रा ख़ुमार7 तो हो।
दश्त-ए-दिल8 है अरसे से बारिश का मुंतज़िर,
दर्द-ख़ेज़ 9 दिल हमारा ज़रा गुलज़ार 10 तो हो।
1. घमंडी; 2. आँख; 3. कठिन; 4. जागृत; 5. खिड़की; 6. ज़रूरी; 7. नशा; 8. दिल का रेगिस्तान; 9. दर्द भरा; 10. फूलों का बगीचा।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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