वो लड़की सोलह की
बातें सत्रह की
क्या अजीब थी वो,
पर नसीब थी वो,
जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है
लहज़े बड़े नाज़ुक से थे
खनकती हर आवाजे उसकी
वो बोल भी दे गर दो टूक तो,
खिल उठता दिल झूम के
चाबुक सी जुबां उसकी
नरम कलेजे की ठंडक- सी
लगे सौ चाँद से रौशन थी
जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है
वो मौसमी ताज़ी हवा
थी मेरी वो ऐसी दुआ
जिसे रखा छुपाके दिल में
उसके हरेक मुश्किल से
कभी ऐसी दूरी न थी
अरे वो बड़ी भोली – सी थी
कहने से उसके मैं बहक जाता
ऐसी वो वहम – सी थी
कभी मेरे लिए वो गुनगुनाती
रिंगटोन दिल के वो सुनाती
ऐसा जांचता दोनों का मौसम
कम रहते गम और उलझन
जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है
वो कभी कड़वी कभी मीठी – सी बातें
करती रहती दिन और रातें
सुबह की बाते उसकी अच्छी
लगती मुझे उठने से पहले
ऐसी वो मासूम- सी लड़की
जिसे जगाता मैं फोन करके
पर उठती कहाँ वो मुझसे लड़ती
जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है
दूब पर नंगे पाँव चलके
जाते बतियाने यूँ ही खुल के
कई बहाने निकाल ही लेते
ऐसा उस पे जान छिड़कते
क्या जाने वो मगरूर लड़की
जो रहती थी वो अकड़ी-अकड़ी
जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है
मनोज कुमार यकता

Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.