अंग्रेज रूपी कंश हेतु वह तो कृष्ण कलेवर था , करतूश को भोजन माना फंशी को जेवर था , वतन के लिये डर न पाया जेल की काली रातो से, उसका वर्णन करू मैं कैसे […]
अंग्रेज रूपी कंश हेतु वह तो कृष्ण कलेवर था , करतूश को भोजन माना फंशी को जेवर था , वतन के लिये डर न पाया जेल की काली रातो से, उसका वर्णन करू मैं कैसे […]
किस्मत हमारी लटक रही है जैसे पाव में पायल , भारत माँ विलख रही है जैसे दीन-दुखी घायल , जिस आँचल में पले- बढे उसमे बम- गोले फुट रहे है , एक सिरे से खुद […]
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