तेरी तस्वीर रू ब रू कर ली
जब भी जी चाहा गुफ्तगू कर ली
हम ने दिल में बसा लिया तुम को
अपनी हर सांस मुश्कबू कर ली
प्यार के इक हसीन धागे से
जिंदगी हम ने फिर रफू कर ली
कारवां की नहीं खबर हमको
हम ने बस तेरी जुस्तजू कर ली
दम निकल जाये कब जुदाई में
वस्ल के दिन की आरजू कर ली
याद खालिक की आयी जब अज्ञात
बंदगी हम ने बे वुजू कर ली
Author: ajay agyat
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ग़ज़ल
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Ghazal
हिसारे जात से बाहर निकल के देखते हैं
चलो खुद का नज़रिया हम बदल के देखते हैं …
सफर का शौक है हम को कहीं भी ले चलो तुम
तुम्हारे साथ भी कुछ दूर चल के देखते हैं….
ज़माने को बदलना तो नहीं वश में हमारे
खुद अपने आप को ही हम बदल के देखते हैं ….
किसी को फिक्र है कितनी चलो ये आज़माएँ
खिलौनों के लिए हम भी मचल के देखते हैं…
भला ये कौन है जो तीरगी से लड़ रहा है
अँधेरों से ज़रा बाहर निकल के देखते हैं….
चलो मौका मिला है दिल की हसरत पूरी कर लें
तुम्हारे साथ भी कुछ पल टहल के देखते हैं….
लकीरें हाथ की शायद बदल ही जाएँ मेरी
ज़रा सा वक़्त के साँचे में ढल के देखते हैं …. -
ग़ज़ल
कौन है जिसने ज़ख्मों को सहलाया है
चेहरे पर मुस्कान सजाये आया है
क्या ग़म है, यह कैसा हाल बनाया है
फूल सा हंसमुख चेहरा क्यों मुरझाया है
डूब न जाये ये आकाश समंदर में
कश्ती जैसा चाँद उतर कर आया है
कितने ही घर टूटे हैं इस बस्ती के
तब जाकर रस्ता चौड़ा हो पाया है
क्या बतलायें हमने कैसे पलकों पर
शब् भर ही ख्वाबों का बोझ उठाया है
पाला है इक मीठा ग़म अज्ञात तभी
मुश्किल से इक शेर कहीं हो पाया है -
ghazal
कौन है जिसने ज़ख्मों को सहलाया है
चेहरे पर मुस्कान सजाये आया है
क्या ग़म है, यह कैसा हाल बनाया है
फूल सा हंसमुख चेहरा क्यों मुरझाया है
डूब न जाये ये आकाश समंदर में
कश्ती जैसा चाँद उतर कर आया है
कितने ही घर टूटे हैं इस बस्ती के
तब जाकर रस्ता चौड़ा हो पाया है
क्या बतलायें हमने कैसे पलकों पर
शब् भर ही ख्वाबों का बोझ उठाया है
पाला है मीठा इक ग़म अज्ञात तभी
मुश्किल से इक शेर कहीं हो पाया है
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ghazal ग़ज़ल
वक़्त के साँचे में ढलना सीख लो
गुफ्तगू का शीरीं लहजा सीख लो
छोड़ कर तुम आहनी अपनी रविश
मोम की सूरत पिघलना सीख लो
कायदा पढ़ना नहीं काफी मियां
कायदे से बात करना सीख लो
शोख लहरों सा मचलना छोड़ कर
शांत सागर सा ठहरना सीख लो
दोस्तों से प्यार तो करते सभी
दुश्मनों से प्यार करना सीख लो