ghazal


कौन है जिसने ज़ख्मों को सहलाया है

चेहरे पर मुस्कान सजाये आया है

क्या ग़म है, यह कैसा हाल बनाया है

फूल सा हंसमुख चेहरा क्यों मुरझाया है

डूब न जाये ये आकाश समंदर में

कश्ती जैसा चाँद उतर कर आया है

कितने ही घर टूटे हैं इस बस्ती के

तब जाकर रस्ता चौड़ा हो पाया है

क्या बतलायें हमने कैसे पलकों पर

शब् भर ही ख्वाबों का बोझ उठाया है

पाला है मीठा इक ग़म अज्ञात तभी

मुश्किल से इक शेर कहीं हो पाया है

 

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ग़ज़ल

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