Author: Anita Sharma

  • तुम झूठ किसी और दिन बोलना

    सच कभी हमारा दामन नहीं छोड़ता 
    कोई भटकाव हमारा प्रण नहीं तोड़ता 
    जब भी विरोधाभास का आभास हुआ 

    हम कोई प्रतिक्रिया देते वक़्त नहीं भूले 
    अपने शब्दों को बोलने से पहले तोलना 

    फिर भी जाने क्यूँ कहने वाले कह ही गए 
    तुम झूठ किसी और दिन बोलना
    तुम झूठ किसी और दिन बोलना

    हमने फिर भी बेरुखी नहीं अपनायी 
    लाख चाहे लफ़्ज़ों के हेर फेर की 
    अक्सर बेतरतीबी से चोट खायी 

    लेकिन सम्मान देने की खातिर 
    हमने कभी फटे में टांग न अढ़ाई 

    क़श्मक़श में दिल से जो बात की
    बस अपने दिल से ये आवाज़ आयी 

    कभी अपने इस बड़ी कमज़ोरी का 
    तुम राज़ किसी के आगे नहीं खोलना

    फिर भी जाने क्यूँ कहने वाले कह ही गए 
    झूठ किसी और दिन बोलनातुम
    तुम झूठ किसी और दिन बोलना

  • किरदार

    जटिल है किसी को पूर्णतः समझना 
    अस्थिरता रहती है सबके जीवन में

    क्यों मानक तय करना किसी के लिए
    गुज़रता है हर कोई अलग संघर्षों से

    हर शख्स में दो किरदार जीवित हैं 
    अपनी सच्चाई अपने ही साथ है 

    हम किस किरदार को जीना चाहते हैं 
    ये निभाना भी सिर्फ अपने हाथ है 

    कोई इतना अनुभवहीन नहीं यहाँ 
    हर बंदा परिपक्व ही दिखता है 

    विचारों में भिन्नता हो भी तो क्या 
    ज़रा सा संभल रिश्तों को जीवित रखता है

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