Author: Ashok babu Mahour

  • मुक्तक

    मुक्तक

    आजकल थोड़ा खफा सा रहता है
    जग रहा मगर सोया सा रहता है
    पर जाने क्या है मजबूरी उसकी
    वो बैठा हुआ थका सा रहता है ।

    अशोक बाबू माहौर

  • हाइकू

    हाइकू

    आँख मलती
    जग रही बिटिया
    मुँह बनाती |

    ठप्प दुकान
    नहीं कोई ग्राहक
    बुरा समय |

    गलियाँ तंग
    आवाजाही हो रही
    चुभे दीवार |

    अशोक बाबू माहौर

  • दोहा

    फूटी मटकी रख दयी, माटी लेप लगाय
    पानी पल पल रिस रहा, मन भी धोखा खाय।

    अशोक बाबू माहौर
    10 /12 /2018

  • हाइकु

    हथेली पर
    सपनों की घड़ियाँ
    साकार नहीं।

    नदी के पार
    रेत के बडे़ टीले
    हवा नाचती।

    अशोक बाबू माहौर

  • हाइकु

    हथेली पर
    सपनों की घड़ियाँ
    साकार नहीं।

    नदी के पार
    रेत के बडे़ टीले
    हवा नाचती।

  • लौट आने दो उस हवा को

    लौट आने दो उस हवा को
    गुनगुनाने दो उस हवा को
    वह आयी है गीत सुनाने
    थरथराने दो उस हवा को।

    अशोक बाबू माहौर

  • स्वच्छ भारत

    मिलकर साथ
    हाथ मिलायें
    खुद जागें
    और जगायें
    स्वच्छ भारत अभियान
    सफल बनायें।
    गली मोहल्ले गंद मुक्त हो
    सड़कें स्वच्छ चमके
    देहरी द्वार महक उठे
    ऐसा संघर्ष अभियान चलायें
    स्वच्छ भारत अभियान
    सफल बनायें।
    स्वच्छ हो कोना कोना
    मधुर लगे हर राह चलना
    रौनक हो भारत में
    आओ खुलकर साथ निभायें
    स्वच्छ भारत अभियान
    सफल बनायें।

  • सवाल पूछा

    संस्कार में दबे
    बच्चे से
    घूरते हुए
    अध्यापक ने
    सवाल पूछा,
    बेटा ये बताओ
    हम कौन?
    बच्चा मुस्कुराते बोला,
    अध्यापक जी
    आप गुरु हम शिष्य
    यानी गुरु धाम में
    हम पढ़ रहे
    आप पढ़ा रहे
    ‘हम कौन?
    हम कौन?’

    अशोक बाबू माहौर

  • पंछी

    उडता पंछी
    नील गगन फैला
    विशाल हाथ।

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