Author: Muhammad Asif Ali

  • saliqe se hawaon mein jo khushbu ghol sakte hain

    सलीक़े से हवाओं में जो ख़ुशबू घोल सकते हैं
    अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जो उर्दू बोल सकते हैं

    ~ मुहम्मद आसिफ अली

  • Khwaab Ko saath Milkar Sajaane Lage

    ख़्वाब को साथ मिलकर सजाने लगे
    घर कहीं इस तरह हम बसाने लगे
    कर दिया है ख़फ़ा इस तरह से हमें
    मान हम थे गए फिर मनाने लगे

  • अपनी क़िस्मत को फिर बदल कर देखते हैं

    अपनी क़िस्मत को फिर बदल कर देखते हैं
    आओ मुहब्बत को एक बार संभल कर देखते हैं

    चाँद तारे फूल शबनम सब रखते हैं एक तरफ
    महबूब-ए-नज़र पे इस बार मर कर देखते हैं

    जिस्म की भूख तो रोज कई घर उजाड़ देती है
    हम रूह-ओ-रवाँ को अपनी जान कर के देखते हैं

    छोड़ देते हैं कुछ दिन ये फ़ज़ा का मुक़ाम
    चंद रोज़ इस घर से निकल कर देखते हैं

    लौह-ए-फ़ना से जाना तो फ़ितरत है सभी की
    यार-ए-शातिर पे एतिबार फिर कर कर देखते हैं

    कौन सवार हैं कश्ती में कौन जाता है साहिल पर
    सात-समुंदर से ‘आसिफ’ गुफ़्तगू कर कर देखते हैं

    ~ मुहम्मद आसिफ अली (भारतीय कवि)

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