कविता – ऐसा वक्त कहाँ से लाऊं वेफिकरी की अलसाई सी उजली सुबहें काली रातें हकलाने की तुतलाई सी आधी और अधूरी बातें आंगन में फिर लेट रात को चमकीले से तारे गिनना सुबह हुए […]
कविता – ऐसा वक्त कहाँ से लाऊं वेफिकरी की अलसाई सी उजली सुबहें काली रातें हकलाने की तुतलाई सी आधी और अधूरी बातें आंगन में फिर लेट रात को चमकीले से तारे गिनना सुबह हुए […]
चारो दिशाओं में छाया इतना कुहा सा क्यों है यहाँ जर्रे जर्रे में बिखरा इतना धुआँ सा क्यों है शहर के चप्पे चप्पे पर तैनात है पुलिसिया फिर भी मचा इतना कोहराम सा क्यों है. […]
कविता—क्या बताता तब आधी रात होने की कगार पर खड़ी थी लेकिन वो थी कि अपने सवाल पर अडी थी पूंछती थी कितनी मोहब्बत मुझसे करते हो सब झूठा खेल है या सच में मुझपर […]
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