Brajanandan Gupta, Author at Saavan's Posts

आखिरी मुलाकात

रात भर होंठों पर मुस्कान, भोर से ही सीने में गुलों का खिलना था बात कोई नई न थी, बस इस शाम अपने हमदर्द से मिलना था । ख़ैर,शाम ढ़लने के साथ ही, सौ रूपये लिए घर से निकल पड़ा सुनसान सड़कें, आबादी कम रिक्शा न मिला तो पैदल ही चल पड़ा ढ़ीले-ढ़ाले कपड़े,चमड़े की चप्पल पर सरगर्मी साँसे लिए चलता रहा, कदम दर कदम,मर्तबा तर मर्तबा उससे मिलने की खुशी में पिघलता रहा धड़कने तेज़, साँसे उससे भी तेज़ न थका, न रुका ... »