जैसे जैसे मकर संक्रान्ति के दिन करीब आते हैं हर जगह पतंग! हर जगह पतंग! ये कागज की पतंगें बहुत आनंद देती हैं नीले आसमान पर, एकमात्र खिलौना सबको मंत्रमुग्ध कर देते हैं हम सभी […]

हमें ये नया साल नहीं स्वीकार जिसमें वही हालात, वही हार देश में मचा हुआ है हाहाकार कविता हुई है अब लाचार ठिठुर रहा गणतंत्र है जनता कुहरे में कहीं गुम है घर -घर है […]

रिमझिम रिमझिम वर्षा से, जब तन मन भीगा जाता है, राग अलग सा आता है मन में, और गीत नया बन जाता है I  कोशिश करता है कोई शब्दों कि, कोई मन ही मन गुनगुनाता […]