हमें ये नया साल नहीं स्वीकार

हमें ये नया साल नहीं स्वीकार
जिसमें वही हालात, वही हार
देश में मचा हुआ है हाहाकार
कविता हुई है अब लाचार

ठिठुर रहा गणतंत्र है
जनता कुहरे में कहीं गुम है
घर -घर है अभी तक गरीबी
जन कर रहा गुहार
हमें ये नया साल नहीं स्वीकार

Comments

10 responses to “हमें ये नया साल नहीं स्वीकार”

  1. Kanchan Dwivedi

    अच्छी प्रस्तुति

  2. Amod Kumar Ray Avatar
    Amod Kumar Ray

    वाह।

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