काश! कोई तो रास्ता निकले. मुश्किलों से मेरा गला निकले. जान..छूटेगी.. उसके.. छूने से, जान आये तो मेरी जां निकले. लाख सदियों में तय नहीं होगा, फ़ासले.. इतने दरमियां निकले. कौन.. होता हूँ.. दोष दूँ […]

माँ के दिल में बसर नहीं छोड़ा. बाकी कोई कसार नहीं छोड़ा. घर की मजबूरियों ने भेजा है, हमनें यूँ ही शहर नहीं छोड़ा. —–डॉ.मुकेश कुमार (राज गोरखपुरी) www.facebook.com/drmkraj2010

“जब चाँद भीगता था छत पर” बहका सावन-महकी रुत थी, ये हवा भी मीठी चलती थी. जब चाँद भीगता था छत पर, तब बारिश अच्छी लगती थी. वो बाल खुले बिखरे-बिखरे, होठों पे’ कभी आ […]