जरा सोचना पल भर के लिए, दफन वो सारे जज्बात जला देना.. आना बस एक बार और मेरी कलम को, ग्रहण की वो शाम दिखा देना.. सुन लेना मेरे मुंह से सत्य सराहना, तुम उन्ही […]

जब भी बैठता हूं किसी सिरहाने से सटकर, बहुत सी यादें याद आ जाती हैं… इस आधुनिकता के खेल में भी मुझे, अपने बचपन की याद आ जाती है.. रसना खुश नही इन मंहगे पकवानो से, बस […]

शहर छोड़ गये हो सोचा मैंने, जब से तुम नजर नही आये… अजीब हो तुम भी शहर में होकर भी, तुम हमारे शहर नही आये… जो तुम न दिखते हो पास तो, अल्फाजों की निंदा […]