सवा ले चल हमें भी उस निशाँ तक उमीदें रक़्स करती हैं जहाँ तक तसव्वुर की रसाई है जहाँ तक किसी दिन तो मैं पहुँचूंगा वहाँ तक हमारी ज़िन्दगी की दास्ताँ तक ना पहुँचा कोई […]
सवा ले चल हमें भी उस निशाँ तक उमीदें रक़्स करती हैं जहाँ तक तसव्वुर की रसाई है जहाँ तक किसी दिन तो मैं पहुँचूंगा वहाँ तक हमारी ज़िन्दगी की दास्ताँ तक ना पहुँचा कोई […]
अब पैकर-ए-ख़्याल-ए-सनम बन गया हूँ मैं यानी वजूद-ए-लुत्फ़-ओ-करम बन गया हूँ मैं اب پیکرِ خیالِ صنم بن گیا ہوں میں یعنی وجودِ لُطف و کرم بن گیا ہوں میں यूँ छू रही हैं मुझ को […]
रस्ता मिला न मंज़िल रहबर की रहबरी में । हम यूँ भटक रहे हैं सहरा-ए-जिंदगी में ।। तुम तैर कर तो देखो सूखी हुई नदी में । फर्क़ आएगा समझ में खुश्की में और तरी […]
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