कुछ तुम सुनाओ कुछ मैं सुनाऊँ कुछ तुम कहो कुछ मैं कहूँ चुरा कर कुछ पल तन्हाईयों से खेलें आँख-मिचौनी कुछ तुम गुनगुनाओ कुछ मैं गुनगुनाऊँ गूँज उठेगी शहनाईयाँ मन के झर्झर खंडहरों में फिर […]

आहिस्ता-आहिस्ता रखना कदम इन नाजुक पगडंडियों में वक्त सो रहा है रात के सन्नाटे में चांदनी रात के आँचल तले खोया है कांच के सपनों की दुनिया में तुम्हारे क़दमों की इक आहट से कहीं […]

कभी बनकर कोई ख़्वाब मेरी निंदिया तू चुरा लेता कभी बनकर हवा का झोंका आँचल को तू खींच लेता बता तो सही तू है कौन कभी बारिश की बूँद बनकर कोमल बदन को भिगो देता […]

हिमालय के उतुंग शिखर से सिंह ने भरी ऊँची दहाड़ है तूफान क्या टकराएगा उससे जो स्वयं फौलादी पहाड़ है सारे जहाँ में अब भगवा ही लहराएगा माटी का लाल अब तिरंगा फहराएगा सौगंध इस […]