चार दीवारे और इक छत, इत्ता सा था घर मेरा
भूखी जमीन आज उसे भी निगल गयी
Author: Mukul Gagrani
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कुछ लफ़्ज़ ठहरा रखे हैं कागज पर
कुछ लफ़्ज़ ठहरा रखे हैं कागज पर
क्या पता कभी कोई कविता बन जायें
कुछ दिनों को भी जोड रखा है
शायद कहीं ये भी कभी जिंदगी बन जायें
