हिसाब की पंचायत वहाँ लगती हैं जहाँ दोनो तरफ सौदागर होते हैं लूटतें हैं दिल की दौलत जब चितचोर अक्सर ये लूटरोंसे लोग बेखबर होते हैं बेहिसाब नुक़सान होता है दिलदार का जब दिल्लगी मे […]

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर, केवल जिल्द बदलती पोथी। जैसे रात उतार चाँदनी, पहने सुबह धूप की धोती, वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों! चंद खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा […]