शीर्षक – अस्थिर जो सोचती हूँ अपने बारे में शायद किसी को समझा पाऊँ, मैं वो पानी की बूंद हूँ जो आँखों से आँसू बनकर छलक जाऊँ तस्वीर बनाना आसान हैं किसी की कोशिश करती […]

शीर्षक – मृत्योपरांत स्मरण (एक बेटी के भाव अपने पिता की मृत्यु पर ) जिसने हाथ पकड़कर चलना सिखाया आज साथ छोड़ कर जा रहा है वो… गिरकर सम्भलना सिखाया जिसने आज फिर उठने से […]

जवाब… बस देती ही रही हूं जवाब… घर जाने से लेकर घर आने का जवाब… खाने से लेकर खाना बनाने का जवाब… बस देती ही रही हूं जवाब… चित्र से लेकर चरित्र का जवाब… सीता […]

मन ******** मन की बंजर धरती पर फूल उगाए कौन मेरी सोई हिम्मत को,फिर से जगाए कौन बिखरा-बिखरा हैं मन मेरा टूटा टूटा जाए कल्पनाओ में मेरे फिर आये कौन जहाँ खो गई सुंगध सुमनों […]

माँ, मैं तुम्हारी गलतियों को फिर नहीं दोहराउंगी मैं अपने बेटों को औरत की इज़्ज़त करना सिखाऊंगी माँ,मैं तुम्हारी गलतियों को फ़िर नहीं दोहराउंगी औरत होने का मतलब डरना नहीं मैं अपनी बेटियों को सिखाऊंगी […]

तू जो होती माँ मैं कभी ना रोती माँ मैं भी स्कूल में सबके साथ तेरे बनाए पराठे खाती..माँ सब बच्चो की तरह मैं भी ठहाके लगाती..माँ तू जो होती माँ मैं कभी ना रोती.. […]

समझाये उन्हें क्या, जो अपनी बातों से मुकर गए । वो करते रहे, गैरो की परवाह जिनके अपने आशियाने उजड़ गए । कभी मिलोगे तुम, दिल से भी हमसे या मुहोब्बत के ज़माने गुजर गए… […]

उसकी आबरु को यहाँ छीन लिया जाता हैं, जिस देश मे”बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ” का नारा दिया जाता हैं, हर छोटे मसले पर यहाँ बड़े फैसले होते हैं, बस अहम बात को दबा दिया जाता हैं, […]

सिर्फ़ अपनी झूठी शान दिखाते हैं लोग दिल छोटा रखते हैं इमारत बडी बनाते हैं लोग नफ़रत दिल मे है प्यार जताते है लोग अपने सच से हैं बेख़बर ओरो को आईना दिखाते हैं लोग […]