ना बिलखे भूख से ना कोई बच्चा नंगा रहे ना हो आतंक के साये ना कहीं कोई दंगा रहे मेरे भारत में चहुँ ओर बस प्रेम की गंगा बहे “आदि” का हो अन्त तब उसका […]

पितरों के तर्पण को जैसे, थाली में खीर जरुरी है, भारत माँ के श्रृंगार को वैसे, ही कश्मीर जरुरी है| चमकी थी जो सत्तावन में, अब वो तलवार जरुरी है, प्यार मोह्हबत बहुत हो गया, […]

कभी श्रापित अहिल्या सी पत्थर बन जाती है कभी हरण होकर सीता सी बियोग पाती है कभी भरी सभा में अपमानित की जाती है कभी बेआबरू कर अस्मत लूटी जाती है कभी बाबुल की पगड़ी […]