Author: Suman Dhingra Duggal

  • हवा के नर्म परों पर सलाम लिखती हूँ

    हवा के नर्म परों पर सलाम लिखती हूँ
    गुलों की स्याही से जब जब पयाम लिखती हूँ

    बड़ा सहेज के रखती हूँ तेरे खत सारे
    जो सुब्हो शाम मैं तेरे ही नाम लिखती हूँ

    जिसे मैं दुनिया के डर से न कह सकी अब तक
    वही फसाने ख़तों में तमाम लिखती हूँ

    ज़ुनूने इश्क में तेरे मैं खो चुकी इतनी
    जो बेखुदी में सवेरे को शाम लिखती हूँ

    नहीं की मयकशी ता उम्र ,रिंद हूँ फिर भी
    इसलिए तेरी आँखों को जाम लिखती हूँ

    मिरे करीब से जिस वक्त तुम गुज़रते हो
    तुम्हारी चाल को मस्ते खिराम लिखती हूँ

    कलम की नोक पे आता है नाम ही तेरा
    मैं जब भी कोई अछूता कलाम लिखती हूँ

  • दूर रह कर कभी दूर नहीं रहता है

    दूर रह कर कभी दूर नहीं रहता है
    मेरी चाहत है सदा दिल के मकीं रहता है

    देखिए दिल और नज़र में है ताअल्लुक कैसा
    चोट लगती है कहीं दर्द कहीं रहता है

    बामो दर छूले अगर दिल के मोहब्बत आकर
    ज़िदगानी में वही लम्हा हसीं रहता है

    सोच कर फैसले करता तो संभल सकता था
    बेवफाई पे मोहब्बत का यकीं रहता है

    जिसने गुलज़ार किया है मेरी वीरानी को
    बन के तक़दीर वही दिल में मकीं रहता है

    घेर लेती हैं जहाँ बंदिशे दुनिया मुझको
    ज़ज्बा ए वस्ल मिरा सोग नशीं रहता है

    मुब्तिला रहता है शैदाई सा मन ख्वाबों मे
    इश्क में वक्त का एहसास नहीं रहता है

  • तुम जो आओ ख्वाब में तो राब्ता रह जाएगा

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    तुम जो आओ ख्वाब में तो राब्ता रह जाएगा
    इक दिया उम्मीद का दिल में जला रह जाएगा

    पूछ लो तुम हाल मेरा बस दिखावे के लिए
    के भरम दिल में मुहब्बत का ज़रा रह जाएगा

    दूर होकर ज़िंदगी भी है पशेमाँ सी मेरी
    तेरे बिन ज्यूँ रूह से पैकर जुदा रह जाएगा

    हम गुज़र जाएंगे इक दिन इस जहां ए फानी से
    छूट जाएगा यहीं सब तज़किरा रह जाएगा

    उम्र के हाथों बदल जाएंगे सबके चेहरे भी
    वह पुराना अक्स फिर तू ढूँढता रह जाएगा

    वार दिल पर इस जुबां का देखो होता है बुरा
    ज़ख्म तो भर जाएगा पर आबला रह जाएगा

    आँधियों की ज़द में हैं कुछ टिमटिमाते से दिये
    जिस दिये में जान होगी वह दिया रह जाएगा

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  • गीत गाती रही रात भर

    गीत बुलबुल सुनाती रही रात भर
    दिल में अरमां जगाती रही रात भर

    वादे गिनते रहे तेरे तारों के संग
    चाँदनी दिल जलाती रही रात भर

    ज़द पे किसने हवाओं की छोड़ा इसे
    शम’अ ये थरथराती रही रात भर

    ख्वाबों का पैरहन मेरी आँखों पे था
    नींद भी आज़माती रही रात भर

    इश्क़ के सुर में ये क्या हवा ने कहा
    खामुशी गीत गाती रही रात भर

    चाँद कतरा के मुझसे गया जब निकल
    बेबसी मेरी मुस्कुराती रही रात भर

    किसके ख्वाबों की आहट सुनाई पड़ी
    याद तेरी जगाती रही रात भर

    चुन के खुशबू गुलों से सजा दी ग़ज़ल
    नाम इक गुनगुनाती रही रात भर

  • खयाले यार से दिल खुशगवार कर लेंगे

    खयाले यार से दिल खुशगवार कर लेंगे
    मिला न तू तिरे ख्वाबों से प्यार कर लेंगे

    नसीब सबको नहीं हैं गुलाब की राहें
    नहीं हैं फूल तो काँटो से प्यार कर लेंगे

    किसी के वादे का हम ऐतबार कर लेंगे
    लगे ये झूठा मगर इंतजार कर लेंगे

    है अरमां दिल का रहो जिंदगी मे तुम मेरी
    जहां से खुद को सनम दरकिनार कर लेंगे

    लबों पे ठहरी हैं बातें न जाने अब कितनी
    मिलोगे गर वही शिकवे हज़ार कर लेंगे

    सदाऐं देती हैं मुझको ये बिसरी सी राहें
    गली को अब तेरी हम रहगुजार कर लेंगे

    मिले जो खुशनुमा सा साथ उम्र भर तेरा
    सुलगते सहरा को ठंडी फुहार कर लेंगे

    तड़पती रहती हैं जो हसरतें मेरी पामाल
    उन्हें ही दफन करेंगे़ मज़ार कर लेंगे

    अधूरे ख्वाब हैं इन आँखों में बहुत सारे
    तेरा भी नाम उन्हीं में शुमार कर लेंगे

    सुमन ढींगरा दुग्गल

  • मैं ग़ज़ल बन किसी कागज़ पर बिखर जाऊँगी

    तेरी आँखों में रहूँगी तो सँवर जाऊँगी
    गर तेरे बदले मिले दुनिया मुकर जाऊँगी

    ख्याल हूँ कैद न कर तू मुझे इन पलको में
    खुशबू बन तेरा मै दामन छू गुज़र जाऊँगी

    छूना मत तल्ख़ हक़ीकत भरे हाथों से
    ख्वाब नाज़ुक हूँ मै आँखों का बिखर जाऊँगी

    रोकते काश मुझे इक दफा यह हसरत थी
    रंज लेकर यही मिट्टी में उतर जाऊँगी

    तेरी आँखों से गिरी सूखे से पत्ते जैसी
    बह के सैलाब में इस गम के किधर जाऊँगी

    मेरे ज़ज्बात तो बहते हैं किसी दरिया से
    मैं ग़ज़ल बन किसी कागज़ पर बिखर जाऊँगी

  • निगाहें उठाकर जिधर देखते हैं

    suman d

     

    निगाहें उठाकर जिधर देखते हैं
    तुम्हें बस तुम्हें हमसफर देखते हैं

    उडीं हैं गुबारों सी अब हसरतें भी
    खड़े हम तो बस रहगुजर देखते हैं

    न कर पाई आबाद शहरों की बस्ती
    तो वीरान सा अपना घर देखते हैं

    अंधेरे की चादर से बाहर निकल कर
    चलो बनके नूरे सहर देखते हैं

    किया जो पता जीस्त का अपनी हासिल
    कहाँ कुछ है बस इक सिफर देखते हैं

    किसी संगदिल को भी जो मोम कर दे
    वही लफ्ज़ हम ढूँढ कर देखते हैं

    कभी धूप में आरज़ू की जले हम
    ये दामन भी अश्कों से तर देखते हैं

    ~ सुमन दुग्गल

  • पतंग

    पतंग

    न बाँधों मन पतंग को,उड़ जाने दो नवीन नभ की ओर
    हंस सम भरने दो,अति उमंग मे नई एक उड़ान स्वतंत्र
    भावों की डोर मे बंध निर्भय,करने दो अठखेलियाँ स्वच्छंद
    न खींचो धरा की ओर,बाँध पुरानी रस्मों,नियमों की डोर
    उड़ जाने दो मन पतंग को सुदूर कहीं नील गगन की ओर

    ****

    सतरंगी भूले मधुर सपनों के झिलमिल कागज से सजकर
    कामनाओं की सुकोमल,मृणालिनी सी तीलियों से बंधकर
    आनन्दमग्न भरने दो उड़ान नई,खुली हवा मे चहुँ ओर
    डोर रिश्तों की बाँध,निष्ठुर खींचो न यूँ धरा की ओर
    उड़ जाने दो मन पतंग को सुदूर कहीं नील गगन की ओर

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    नाप लेने दो व्योम इसे यह नव नीलाभ सा अपरिचित
    चख लेने दो प्यासे मन बावरे को उछाह मे आजादी का अमृत
    करने दो किलोल,विस्मृत कर भू को ,हो लेने दोअब हर्षित
    बाँध उम्र के बंधन,न काटो निर्ममता से कोमल मन की डोर
    उड़ जाने दो मन पतंग को सुदूर कहीं नील गगन की ओर

     

  • देखिए आज ज़माना भी नहीं अच्छा है

    देखिए आज ज़माना भी नहीं अच्छा है
    इस तरह घाव दिखाना भी नहीं अच्छा है

    हम खतावार नहीं खता फिर भी मानी
    दिल बिना बात दुखाना भी नहीं अच्छा है

    दिल घिरा गम के समंदर में जजीरे जैसा
    दर्द में और डुबाना भी नहीं अच्छा है

    ख्वाब सा जिसको सजाया था कभी आँखों में
    उसको नज़रों से गिराना भी नहीं अच्छा है

    यूँ मयस्सर नहीं होते ये मेहरबाँ लम्हें
    रूठ कर इनको गँवाना भी नहीं अच्छा है

    आँखें चुप रह के भी करती हैं बहुत सी बातें
    बात दिल की तो छुपाना भी नहीं अच्छा है

    हमकदम होगी मसर्रत में ही देखो दुनिया
    इसकी खातिर यूँ भुलाना भी नहीं अच्छा है

    ~ सुमन दुग्गल

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