Author: Vipendra Pal Singh
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वो जो गुजर गये यूं मुंह फ़ेरकर
वो जो गुजर गये यूं मुंह फ़ेरकर
[मजरूह – जख्मी] -

उस अफ़साने की बात करते हो
सिमट गया जो चंद अल्फ़ाजों में, उस अफ़साने की बात करते हो
खुद को हमारी जिंदगी बनाकर, छोड जाने की बात करते हो |
नहीं है कोई अंजाम इस अफ़साने का, मालूम था हमें
जला रखा था इक उम्मीद का चिराग़, उसे बुझाने की बात करते हो |
पहले से दफ़न है कई अहसास मेरे दिल की दरख्तों में
कत्ल करके इक और अहसास का, दफ़नाने की बात करते हो |
आ गये है तेरे दर पर हम, अपना सबकुछ छोडकर
अब खुद को छोडकर, लोट जाने क़ी बात करते हो