एक स्त्री कि व्यथा को बचपन से गृहस्त जीवनी को दर्शते हुए सुंदर कविता…
मैं अकेली परी सी बनी
माँ के कर्मों कि बुनी
घर काम को करती
सही किताबों को पड़ती
कभी एक दिन होगायी बड़ी
ब्याह को राज़ी ख़ुशी
फिर उठी डोली कही
ससुराल ने समझा नहीं
बिन सहारे रोती फिरी
प्रेम मोह से लड़ती रही
ईश्वर ने प्रथना सुनी
संतान से झोली भरी
दर्द भरी कहानी मेरी
आँसू जैसे नदी बहीं
जीवन मेरा कही अंकही.
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