यह इश्क़ है।

June 6, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

चंचल , अल्हड़ , बेपरवाह , बेफिक्र ,
यह इश्क़ है।
प्रीतम क़े जाने पर  जो  प्रेयसी को कर दे बाबरा ,
यह इश्क़ है।
जिसके दम  पर मीरा जहर का प्याला बेहिचक पी गई ,
यह इश्क़ है।
नटराज और माँ शक्ति का जिसने मिलन है करवाया ,
यह इश्क़ है।
तरसती रहती है धरती बादलों की उस एक बूँद के लिए ,
यह इश्क़ है।
उसकी इक आवाज सुनने के लिए जो बेचैन है कर देता ,
यह इश्क़ है।
जो सारे ब्रह्माण्ड को है रच गया ,
यह इश्क़ है ,
चंचल , अल्हड़ , बेपरवाह , बेफिक्र ,
यह इश्क़ है।
–  अभिषेक शर्मा

सईयां की डोर

January 22, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

रख दो तुम मेरे लिए दुनिया भर के सोने-चांदी ,
पर मैं ना छोड़ू अपने सईयां की डोर।

प्रेम के मंदिर में यह पुजारन उनकी पूजा है कर रही ,
प्रेम के मनके चुन चुन के प्रेम की माला मन में है बुन रही ,
हो गयी है वो बाबरी , जग  की झूठी माया से अब उसे कोई मोह नहीं।
बन गयी है वो जोगन , सईयां से बढ़कर अब कोई धर्म नहीं।

अपना इक इक पल मैं अब मैं बस तेरे साथ चाहूँ ,
चौबीस पहर तेरे इस चाँद से चेहरे को निहारूँ।
रग-रग में मैं तुझे बसा लूँ , जुड़ जाएँ ऐसे हमारे नाम ,
जैसे श्याम के बाद लिया जाता है राधा का नाम।

रख दो तुम मेरे लिए दुनिया भर के सोने-चांदी ,
पर मैं ना छोड़ू अपने सईयां की डोर।

–    – अभिषेक शर्मा

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