nazm

कोई शाम फिर रात की बाँहों में दम तोड़ गई
रात भर वो शाम दरवाज़े पे देती रही दस्तक
कुछ धुँधले से साये करीब आकर छूते तो है
अपना पता पूछते है मुझ अजनबी से
कोई लफ्ज फिर गुमसुम है होठों पर
फिर कोई सदा टकराई है कानों में
चौंकते दिन की शक्ल में रात फिरती है
कई रातें बिखर जाती है छोटी छोटी रातों में
कहीं कुछ सहमे हुए मैं बिखरे है भीड़ में
और तलाश है अपने ही किसी टुकड़े की
हाथ की रेखाओं सा बना कुछ जाल
अंदर से झाकता हुआ कोई और मुझसा
लेता हिसाब शामों का, करता कई सवाल
सिहर के निकलती बस यही आवाज़ दबी
कोई शाम फिर रात की बाँहों में दम तोड़ गई
राजेश ‘अरमान’

Comments

3 responses to “nazm”

  1. UE Vijay Sharma Avatar
    UE Vijay Sharma

    कोई शाम फिर रात की बाँहों में दम तोड़ गई … nice

  2. rajesh arman Avatar
    rajesh arman

    thanx

  3. Abhishek kumar

    तू नज्म नज्म सा मेरे

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