Tag: रक्षाबंधन पर कविता

  • राखी का त्योहार है आज

    राखी का त्योहार है आज,
    आजादी का जशन भी है
    बहन की खातिर जीना भी चाहता हूँ
    देश पर मार मिटाने का मन भी है।
    (देश के सैनिक की मन की बात)

  • कलाई पर मौली और माथे पर रोली लगाया करती हैं

    कलाई पर मौली और माथे पर रोली लगाया करती हैं,

    बहनें छोटी हैं मेरी मगर बातें बड़ी ही बनाया करती हैं,

    चुप रहती हैं कभी मुख से कुछ भी माँगा नहीं करती हैं,

    के बांधकर राखी हर बार वो मेरी आयु बढ़ाया करती हैं।।

    राही (अंजाना)

  • याद

    गहरा है ये मेरा प्यार,
    बहना करती है इंतज़ार
    जा बसे तुम विदेश भैया
    कैसे बांधूंगी अब राखी
    राखी के धागों में
    पिरोये प्यार के मोती
    तेरा सुखी रहे संसार
    मत भूलना मेरा प्यार
    आया राखी का त्यौहार
    बहना करती है इंतज़ार

    -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-

  • राखी

    बहना की राखी में,
    राखी के धागों में
    रक्षा है,शिक्षा है
    आशीष है, दुआ है
    अटूट बंधन है
    रोली है चन्दन है
    पावन पर्व का
    अभिनन्दन है

    -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-

  • टूटे कंगन बोल रहे मेरा न्याय करेगा कौन

    मित्रो! अभी हाल ही मे शहीद हुए हमारे देश के चार सैनिको
    को ,अपनी कविता के माध्यम से श्रद्धासुमन अर्पित करते हुये, मैने आप तक ए कविता पहुचाने की कोशिश की है
    अगर आपको ये कविता पसंद आये तो ये बात देश के अन्य लोगो तक पहुचाने की कोशिश करे।
    जय हिंद जय भारत

    टूटे कंगन बोल रहे मेरा न्याय करेगा कौन ।
    मांगो के सिंदूर पूछते यह अन्याय भरेगा कौन ।।

    सीमा पर से उस प्रहरी की आवाजे है चीख रही।
    मेरे बलिदानो की बोलो कीमत भला भरेगा कौन।।

    मै भारत का कलमकार हू
    अपनी भाषा बोल रहा हूँ ।
    प्रजातंत्र के सरदारो से
    नया प्रश्न अब खोल रहा हूँ।।

    कब तक मौन रखोगे अपनी
    चमक ढाल तलवारो की ।
    कब और दंश सेना के ऊपर लगते जायेंगे
    कब तक कायर दुश्मन के हम रोज तमाचे खाएंगे।।

    कब तक मांग भरी, बिधवाए
    सिंदूरो को पोछेंगी।
    कब तक माँ ये बेटो के हित
    ह्रदयस्थल को नोचेंगी ।।

     

    कब तक बहना की राखी का
    अग्निध्वंश करवायेंगे।
    कुछ तो बोलो कब तक
    सैनिक की लाशे उठवाएंगे।।

    चार बीर बलिदानों का
    यह घाव कौन हर सकता है।
    सिंदूरो से सजी मांग
    अब भला कौन भर सकता है।।

    कौन जोड़ पायेगा वह दिल
    माँ का जो शीशे सा टूट गया।
    कीमत कौन चुकायेगा उन हाथों का
    जो राखी को लिए खड़ी बहना से भी छूट गया।।

    वह तो है नादान पड़ोसी
    न जाने किस पर ऐठा है।
    दो बार लात खा करके भी
    फिर आघातों को बैठा है।।

    दो ,दो बार माफ करने का
    यही नतीजा आया है।
    गाँधीवादी अरमानो ने
    फिर से थप्पड़ खाया है।।

    सत्य अहिंसा को अपनाकर
    मतलब इसका भूल गये।
    भूल गये कुर्बानी उनकी
    फाँसी पर जो झूल गए।।

    जब जब अपना इतिहास भूल
    गाँधीवादी अपनाओगे।
    तब तब धुश्मन के हाँथो से
    थप्पड़ खाते जाओगे।।

    सत्य अहिंसा क्या होती है
    मर्यादा को भूल गये।
    गाँधीवादी राह पकड़ ली
    प्रभु राम को भूल गये।।

    भूल गये तुम सत्य अहिंसा
    भारत की परिपाटी है।
    लेकिन रण मे पीठ दिखाना
    कायरता कहलाती है।।

    क्षमा सत्य उसके खातिर
    जो मानवता का रक्षक हो।
    उसके खातिर वध निश्चित है
    जो मानवता का भक्षक हो।।

    अधिक क्षमा करना भी निज मे
    कायरता कहलाती है।
    अधिक अहिंसा का पालन
    निज प्रत्याघात कराती है।।

    स्वाभिमान के खातिर अहि मे
    बिष का भान जरूरी है।
    दुष्ट दलन के खातिर फिर अब
    दंण्ड विधान जरूरी है।।

    याद करो गीता की वाणी
    जो केशव ने गायी थी।
    याद करो प्रभु राम गर्जना
    जो सागर को समझाई थी।।

    हे भारत के पार्थ आज तुम
    महाभारत को भूले हो।
    इसीलिये बलिदान हुए सर
    और शर्म से झूले हो।।

    समय नही है सीमा पे अब
    श्वेत कपोत उड़ाने का ।
    न ही रंग गुलाबी लेकर
    फागुन गीत सुनाने का।।

    भारत माँ के अमर पुत्र
    गांण्डीव उठा टंकार करो।
    शांति यज्ञ की पूजा छोड़ो
    दुश्मन पर अब वार करो।।

    छप्पन इंची सीना वाले
    उठो नया हुंकार भरो।
    सीमाओ पर तोपें दागो
    आर करो या पार करो।।

    जय हिंद जय भारत
    आपका ——–अखिलेन्द्र तिवरी (कवि)
    sri raghukul vidya peeth civil line gonda
    uttar pradesh
    तुलसी जन्मभूमि राजापुर गोण्डा (उत्तर प्रदेश)

    ✋✋✋✋माँ का आशीर्वाद✋✋✋✋✋✋✋

  • मेरे भय्या

    तेरे साथ जो बीता बचपन
    कितना सुन्दर जीवन था,
    ख़ूब लड़ते थे फिर हँसते थे
    कितना सुन्दर बचपन था,
    माँ जब तुझको दुलारती
    मेरा मन भी चिढ़ता था
    तू है उनके बुढ़ापे की लाठी
    ये मेरी समझ न आता था,
    स्कूल से जब तू छुट्टी करता
    मेरा मन भी मचलता था
    फिर भी मैं स्कूल को जाती
    ये मेरा एक मकसद था।

    बड़े हुए हम और बीता बचपन
    फिर तुझको बहना की सुध आई
    हुई जब विदा तेरी बहना
    तेरी आँखें भर आई,
    अब याद आता है बीता बचपन
    कैसे हम हमझोली थे
    एक दूसरे की शिकायत करते
    फिर भी हम हमझोली थे।
    आ गई राखी भय्या अब तो
    तेरी बहना घर आयेगी
    राखी बाँध तेरे हाथों में
    बचपन की याद दिलाएगी।

    — सीमा राठी

  • बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना

    बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना

    जन्म लेकर साथ तुम मेरे पली थी

    भेदभावों के समन्दर में वहीं थीं

    में पला नाजों से लेकिन तुम नहीं

    कौन कहता पीर मन की अनकहीं

    पूज्या कहकर लड़कियों की कैसी साधना

    बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना|1|

     

    मैं पढ़ा, लेकिन रही तुम अनपढ़ी

    मैं खड़ा आगे रही तुम पीछे बढ़ी

    मैंने जो भी माँगा वो मुझे मिला

    लेकिन तुमसे ये कैसा सिला

    चंचला तुम आगे से लड़की होना न मांगना

    बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना |2|

     

    मैंने महसूस की थी तुम्हारी मजबूरी

    हर ख्वाहिश रहती थी तुम्हारी अधूरी

    मेरी शादी में जितना लेना चाहते थे

    तुम्हारी शादी में उतना देना चाहते थे

    लेकिन मेरी तरह तुम्हारी मर्जी क्यों न पूछना

    बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना |3|

     

    मुझे घर में रखा तुम्हें बाहर भेज दिया

    तुम पराई हो गयीं मुझे दिल में सहेज दिया

    जिस घर को तुमने सजाया था वो मेरा है

    जो किसी और ने सजाया था वो तेरा है

    खुद अपने घर को छोड़कर ये कैसा रहना

    बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना |4|

     

    तुम लड़की होकर इतना कैसे सहती हो

    अपनों को छोड़कर दूसरों में कैसे रहती हो

    में लड़का होकर भी घर से अलग नही रह सकता

    जो तुमने सहा उसका दसवां भी नही सह सकता

    ये दर्दों का सिलसिला कब तक है सहना

    बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना |5|

     

    मेरी भी गलती थी लेकिन क्या करता

    तुम्हारे लड़की होने का खामियाजा कैसे भरता

    मैं कुछ न कर सका मुझे इसका अफ़सोस है

    मैं लड़का हूँ इसमें मेरा भी दोष है

    हो सके तो मुझे माफ़ करते रहना

    बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना |6|

  • फ़र्ज़ राखी का

    फ़र्ज़ राखी का

    न था मित्र कोई सखा मेरा
    जन्मा था वो बनके दोस्त मेरा।

    पहली दफा मुस्कुराया वो,
    मन प्रफुल्लित हुआ था मेर।
    जैसे
    गुड़हल के पुष्प से निकली हो एक कली
    और लुटाई हो उसने सुंदरता मुझपर।

    कदम धरती पर रखा था उसने
    और बरसाया था अपना मोहन मुझपर।

    गयी थी मई पीया के,
    मन संकुचित हुआ था मेरा;
    होगा कैसा वो
    मन रूखा हुआ था मेरा।

    नग्न आँखों ने निहारा था उसे
    हेमन्त बरसा था नयनों से मेरे।
    जब विदा हुई थी मैं
    आंसू सुख गए थे मेरे।

    था किया पूरा अपना कर्त्तव्य उसने
    रखा था मान मेरी राखी का
    मई ही अनभिज्ञ थी
    ना चुका सकी फ़र्ज़ उसकी राखी का।

    – Anshita

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