अँधेरा कहीं भी हो दूर होना चाहिए,
सूरज न सही दिए के माफ़िक जलना चाहिए,
क्या हुआ जिंदगी में उदासियाँ बहुत हैं,
औरों की ख़ुशी देखकर भी मुस्कुराना चाहिए।
अँधेरा कहीं भी हो दूर होना चाहिए
Comments
4 responses to “अँधेरा कहीं भी हो दूर होना चाहिए”
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आपने तो दुष्यंत जी की कविता की याद दिला दी
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शुक्रिया।
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बहुत खूब
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nice
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