आयतों की खवाइश में

आयतों की खवाइश में इक मज़ार बन के रह गया
दुनिया के कारखाने का बस औज़ार बन के रह गया

न किसी मंदिर ,न मस्जिद न हरम के क़ाबील हूँ
फूल बनना चाहा था ,बस खार बन के रह गया

शतरंज के मोहरे कभी हुआ करते थे मेरे ग़ुलाम
इक प्यादे की चाल से ,बस हार बन के रह गया

नीव जो हुआ करते थे , किसी बुलंद इमारत की ,
आज अपने घर की गिरी दीवार बन के रह गया

जो कहते थे हम देख हवा को , उसका रुख बता देते है
आज वो खुद इक बंद कमरे का, दीदार बन के रह गया

आहिस्ता हो या बेरहमी से यहाँ फिक्र किसे ‘अरमान’
मेरा क़त्ल खुद मेरे वास्ते कोई ,खुमार बन के रह गया

राजेश ‘अरमान’

Comments

2 responses to “आयतों की खवाइश में”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

Leave a Reply

New Report

Close