इन पत्थरों में तुम

इन पत्थरों में तुम न जाने क्या ढूँढ़ते हो
दुनिया में रहकर कौन सी दुनिया ढूँढ़ते हो

बिक गया हर शख्स अपने ही बाजार में
अब बाजार में कौन सी परछाईया ढूँढ़ते हो

परिंदे आसमाँ में उड़ते ही भले लगते है
फिर अपने घर में क्यों पिंजरे ढूँढ़ते हो

हक़ीक़त से दो-चार जब सारा जहाँ हो गया
तुम किस खबर के वास्ते अखबार ढूँढ़ते हो

किस शक्ल की तलाश में गुम फिर रहे हो
आईने में अपनी कौन सी सूरत ढूँढ़ते हो

मंसूबे किस गुलिश्ता के रखते हो जेहन में
फूलों को जलाकर कौन से फूल ढूँढ़ते हो

जुल्म आखिर इन्तहा में हो गया मुक्कमल
तुम अब तक ज़ुल्म की इब्तेदा ढूँढ़ते हो

तुम कौन से मुकाम पे जा बैठे ‘अरमान’
अपने ही शहर में अपना घर ढूँढ़ते हो

राजेश’अरमान’

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