एक समकालीन गीत

देहरी लाँघी नहीं

घुटन में घुटती रहीं

बच्चे रसोई बिस्तरे की

दूरियाँ भरती रहीं

बंदिशों की खिड़कियों के

काँच सारे तोड़ डाले

लो तुम्हें आजाद करता हूँ |

 ****

पायलों ने पाँव कितने

आज तक घायल किए

घूँघटों की मार से

तुम बहुत व्याकुल हुए

कनक चूड़ी केयूर कंगन

बीस कैरट के हुए

तोड़ कर यह मेखला

फिर से तुम्हें आबाद करता हूँ |

 ****

पेड़ की छाया घनेरी

कहो कैसे मान लूँ

जागीर उनके वंश की

कैसे कहो यह जान लूँ

दो साथ मेरा

और तुम आगे बढ़ो

इस घृणित संवाद को

बरबाद करता हूँ |

 ****

तुम नहीं हो सोच लो

लूट का सामान

रोटियों का परोथन

परित्यक्त पायेदान

उगते हुए दिनमान की

मुस्कान पहली

पीढ़ियों के दमन का

प्रतिवाद करता हूँ|

 ****

बरबादियों के ढेर पर

घेर कर जो ले गए

ढेर होंगे वे अँधेरे

जो अँधेरा दे गए

रोशनी का हक़ तुम्हें

मिल कर रहेगा

लो भरी इजलास में

फरियाद करता हूँ|

****

  • डॉ. मनोहर अभय

 

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

आज़ाद हिंद

सम्पूर्ण ब्रहमण्ड भीतर विराजत  ! अनेक खंड , चंद्रमा तरेगन  !! सूर्य व अनेक उपागम् , ! किंतु मुख्य नॅव खण्डो  !!   मे पृथ्वी…

Responses

New Report

Close