खामोश जुबां से इक ग़ज़ल

रौनक-ए-गुलशन की ख़ातिर अज़ल लिख रहा हूँ
ख्वाईश इन्किलाब की है मुसलसल लिख रहा हूँ।

सब कुछ लूट चुका था बस्तियां वीराँ थी
बेमतलब हुआ क्यूँ फिर दखल लिख रहा हूँ।

आवाजों के भीड़ में मेरी आवाज़ गुम है
अल्फाजों को मैं अपने बदल लिख रहा हूँ।

बेबस आँखों में शोले से उफनते हैं
अंधेरे में हो रही हलचल लिख रहा हूँ।

उम्मीद इस दिल को फिर से तेरा दीदार हो
ख्यालों में तेरे खोया हरपल लिख रहा हूँ।

बेहद खौफ़नाक मंज़र है और क्या बयां करूँ
खामोश जुबां से इक ग़ज़ल लिख रहा हूँ।

अज़ल = beginning
मुसलसल = बार-बार, निरंतर

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जोगबनी-कटिहार छोटी रेल खंड के बिच की यात्रा के दौरान कविता ही मेरी संगिनी रही. हास्य, व्यंग्य, ग़ज़ल कहना सुनना अच्छा लगता है.

4 Comments

  1. Sulabh Jaiswal - June 18, 2015, 6:04 pm

    Please review my poem

  2. Anirudh sethi - November 26, 2015, 12:26 pm

    nice

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