छत्तीसगढ़ के घायल मन की पीड़ा कहने आया हूँ।

मैं किसी सियासत का समर्थन नहीं करता हूँ।
भ्रष्टाचार के सम्मुख मैं समर्पण नहीं करता हूँ॥
सरकारी बंदिस को मैं स्वीकार नहीं करता हूँ।
राजनीति के चाबुक से भी मैं नहीं डरता हूँ।।
मेरी कविता जनता के दुख दर्दों की कहानी है।
मेरी कविता भोले-भाले गरीबों की जुबानी है॥
मैं कमजोरों की बातों को स्याही में रंग देता हूँ।
मैं अबला के ज़ज्बातों को शब्दों में संग देता हूँ।।
मैं अपने कलम से सच लिखने की ताकत रखता हूँ।
धरती माँ की पीड़ा पर मिटने की ताकत रखता हूँ॥
मैं गाँव का वासी हूँ गाँव की बात करता हूँ।
थकेहारे जनमानष में नया जोश भरता हूँ॥
महानदी की धार बनकर आखों से बहने आया हूँ।
किसानों के घायल मन की पीड़ा कहने आया हूँ॥

 

मैं रायपुर और दिल्ली का गुणगान नहीं गानेवाला।
चापलूसी से खीर मिले तो मैं नहीं खानेवाला।।
मैं मज़दूर हूँ मेहनत कस, मज़दूरी मेरा काम है।
हल गीता, फावड़ा बाईबिल, कुदाल ही कुरान है।
मेहनत से जो भी हासिल हो घर वही पकाऊंगा।
नहीं तो अपने खेतों पर मैं भूखा ही सो जाऊंगा।।
फसलें हमारी जल रही और नहरें सुखी-सुखी है।
धरती लहू मांग रही क्या करती वो भी भूखी है॥
नदीं नालों के पानी पर उद्योगों का पहरा है।
सत्ता के आगे हम रोये लेकिन वो बहरा है।।
मैं मजबूर किसान, बैंक का कर्जदार हो गया हूँ।
अनदेखी के कारण मैं अब, बेकार हो गया हूँ।।
बदहाली किसानों का मैं, संसद को दिखाने आया हूँ।
मैं छत्तीसगढ़ के घायल मन की पीड़ा गाने आया हूँ॥

 

पूंजीपतियों का यशगान करुं, ये नहीं हो सकता है।
लुटेरों का मैं सम्मान करूं, ये नहीं हो सकता है।।
मैं कोयले को कोयला और हीरा को हीरा कह सकता हूँ।
बहुत सह लिया है चुपचाप और नहीं सह सकता हूँ॥
मैं सरकारी दफ्तर में गरीबों के लिए आसन मांगता हूँ।
भूखे बच्चों के खातिर मैं दो जून का राशन मांगता हूँ।।
मैं छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ीयों का शासन मांगता हूँ।
न ही झूठी दिलासा और न ही झूठा भाषण मांगता हूँ।।
मैं कोई भी नाजायज़ मांग नहीं करने वाला हूँ।
न्याय की आश लगाये अब मैं मरने वाला हूँ॥
जड़,जंगल, और जमीन मेरी इतनी ही लड़ाई है।
कल जहाँ पर लोहा था, आज वहाँ पर खाई है।।
लुटे हुये पहाड़ों पर मैं, कुछ पौधे बोने आया हूँ
मैं छत्तीसगढ़ के घायल मन की पीड़ा कहने आया हूँ।

 

चार काटे, तेंदु काटे, सैगौन काटे हैं सरकारों ने।
औने-पौने दामों पे, खेत हमारे बेचे हैं साहुकारों ने।।
झांसा देकर विकाश का, हमको फंसाया जाता है।
योजना चाहे जो भी हो बस रिश्वत खाया जाता है॥
इंदिरा आवास पर अधिकारी अपना हिस्सा मांगते हैं।
हम सीधे साधे छत्तीसगढ़ीया दफ्तर दफ्तर नाचते हैं।।
शौचालय के दरवाजों पर सरपंचों ने खूब कमाया है।
मेरे अपने हिस्से में तो खाली कमोड़ ही आया है।।
अमृत दूध के नाम पर अब जहर बांटे जाते है।
भूखे बच्चों की क्या कहिये बेचारे वो भी खाते हैं।।
सरकारी नाकामी ने फिर से दो मासुम जानें ले ली है।
छत्तीसगढ़ की माताओं ने आज ये कैसी पीड़ा झेली है॥
मैं छत्तीसगढ़ीयों के लूट पर सवाल उठाने आया हूँ॥
छत्तीसगढ़ के घायल मन की पीड़ा कहने आया हूँ॥

 

मेरे मन में भी आया मैं अनुपम श्रृंगार लिखूं।
एक राजा एक रानी दोनों का मैं प्यार लिखूं॥
मैं भी पायल और काजल की भाषा लिख सकता हूँ।
मैं भी लैला-मजनूं और हीर-रांझा लिख सकता हूँ।।
लेकिन बस्तर की घाटी से जिस दिन से मैं लौटा हूँ।
देख वहाँ की जिंदगानी आँसूं से आंगन धोता हूँ॥
मैं ही मरता हूँ बस्तर में, और मैं ही मार रहा हूँ।
जीत कोई रहा हो लेकिन मैं छत्तीसगढ़ हार रहा हूँ।।
नक्सल और सरकार के बीच आदिवासी पीस रहे हैं।
संस्कृति और संपदा अब एक-एक करके मिट रहे हैं।।
जंगल सूना-सूना है और सड़कें सारी वीरान पड़ी है।
झीरम घाटी देखकर छत्तीसगढ़ महतारी डरी- डरी है॥
छत्तीसगढ़ के चरणों में सबकुछ अर्पण करने आया हूँ।
छत्तीसगढ़ के

घायल मन की,मैं पीड़ा कहने आया हूँ॥
ओमप्रकाश चंदेल “अवसर”
पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़
7693919758

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Responses

  1. वाह सर जी क्या खूब कही

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