दर्द के चरागों को बुझने की कोई हवा दे दो
ग़ुम हुए लोगों को लौटने का कोई पता दे दो
इन सुर्ख आँखों का कसूर इतना तुम्हारा हिस्सा है
इन आँखों को तुम कोई ख्वाब सुनहरा दे दो
न शजर, न कोई शाख, न पत्तों का कसूर
अपने बाग़ों को बस थोड़ा सा चेहरा दे दो
छोटी छोटी बातों से क्यों जख्म रोज़ देते हो
एक बार ही कोई ज़ख्म मुझे गहरा दे दो
निस्बत कुछ ज़माने से यूँ निभाए न कोई
हर रिवाज़ों पे ज़माने का कोई पर्दा दे दो
हर तरफ बदलने का गर्म है बाजार ‘अरमान’
ले के पुराना मुझे कोई नया गम दे दो
राजेश ‘अरमान’
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