धुँधले आईने से कोई अक्स निकल नहीं पाता
वक़्त की सुइयाँ पकड़ने से वक़्त बदल नहीं जाता
वो मोम सा बना रहता , कोई पत्थर नहीं था
क्या हुआ शख्स वो अब पिघल नहीं पाता
वो कहता रहा रिश्तों को परतों में रहने दो
कुरेदने से कोई रिश्तों का सच बदल नहीं जाता
उसकी हसरत महफूज रहूँ हाथों की लकीरों में
जिन लकीरों को कभी वक़्त बदल नहीं पाता
कितने देखे है ज़माने कितने लड़खड़ाते कदम
जान कर सब फिर वो क्यों संभल नहीं पाता
कौन देखेगा इन हवाओं में मुड़ के ‘अरमान’
साथ दुनिया के आखिर वो क्यों चल नहीं पाता
राजेश’अरमान’
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