न जाने वो कौन थे

न जाने वो कौन थे ,
मोहबत का तवजु दे गए मुझे ,
न जाने वो हमदर्द कौन थे,

लिखी न कभी दास्ताँ दिल की ,
दिल जला वो दे गए ,
जाने वो खुदगर्ज़ कौन थे,

रास्ता ढूंढता मुसाफिर बन जहां  ,
वो राही बन बेसहारा कर गए,
जाने वो सरफिरे कौन थे ,

में चला जहां जो अपनी चाल कही ,
वे काफिला बन साथ चल गए ,
जाने वो हमदम कौन थे,

अब कही अपनी राह पा चूका,
मिले जो वो जन मौन है ,
सोचु में बस यही , न जाने वो कौन थे।


कवि निशित लोढ़ा

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5 Comments

  1. Panna - June 15, 2016, 9:33 am

    Umda

  2. Dev Rajput - June 15, 2016, 3:04 pm

    Bahut ache dost

  3. Rakhi Gupta - June 16, 2016, 9:35 am

    lajabab

  4. Udit jindal - June 19, 2016, 11:12 pm

    Behtareen

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