बंजारा गीत

।। बंजारा – गीत ।।
: अनुपम त्रिपाठी

कोई ख्वाब नहीं, जो ढल जाऊॅं ।
मौसम की तरह से बदल जाऊॅं ॥
तबियत से हूँ ; मैं ! इक बंज़ारा ।
कल जाने कहां को निकल जाऊॅं ॥01॥

आया था घड़ी भर महफिल में ।
यादों को बसाकर इस दिल में ॥
कुछ देर ठहर कर जाना है ।
तुम कह लो कि; ये, दीवाना है ॥
कुछ याद तुम्हारी साथ लिये ।
फिर, जाने कहाँ पे मिल जाऊॅं ॥02॥

पत्थर भी कभी क्या रोया है !
ये, द्वंद कहाँ अभी सोया है ॥
मुझे ‘टू…ट..ना’ होगा उस हद तक ।
इस ‘द……र्द’ को जितना ढोया है ॥
कोई पूछ ले मुझसे पता मेरा ।
बेहतर कि; मैं ! पहिले सम्हल जाऊँ ॥03॥

इक मोड़ कभी न भूलेगा ।
जब ओझल पहली बार हुआ ॥
उन भींगे हुए नयनों ने मुझे ।
अन्दर तक कई–कई बार छुआ ॥
कहीं थम न जाऊॅं…..लहर हूं मैं ।
इक जुम्बिश ही से हिल जाऊॅं ॥04॥

मेरा भी कभी प्यारा घर था…. ।
‘अवनि’ थी मेरी—इक ‘अंबर’ था ॥
‘किलकारियां’ लेती थीं ‘खुशियां’ ।
फिर छोड़ सभी क्यूँ आया यहाँ ॥
हम “बंज़ारों” से न पूछो सब ।
तुमको मैं ये कैसे बतलाऊं ॥05॥

कुछ भी तो मेरे अब पास नहीं ।
थोड़ी भी खुशी की आस नहीं ॥
इक दिल है, मेरे संग आवारा ।
दर्द…सहा…किया…..बेचारा ॥
उस टीस के इक-इक क़तरे में ।
आंसू की तरह न पिघल जाऊॅं ॥06॥

मैं ; आज यहाँ हूँ—कल था वहाँ ।
फिर; होना है मुझको, नहीं हूँ जहां ॥
तुम है—र–त में सब पूछोगे ।
बस ; मेरे ही बारे में सोचोगे ॥
अच्छा हो ; यहाँ , न ठहरूं अब ।
फ़ितरत से न अपनी बदल जाऊॅं ॥07॥

तबियत से हूँ , मैं ! इक बंज़ारा ।
कल जाने कहाँ को निकल जाऊॅं ॥
कोई ख्वाब नहीं जो ढल जाऊं ।
मौसम की तरह से बदल जाऊॅं ॥
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