Anupam Tripathi, Author at Saavan's Posts

आग कहाँ नहीं होती !

( संदर्भ आपातकाल ) ‘वे’ चंद लोग थे जो, आए और ज़ब्त करने लगे आग के संभावित ठिकाने । —– रौशनी गुल कर दी —– चूल्हे ठंडे और, माचिस गीली । : सख़्त पाबंदी थी सूरज पर भी न ऊगने की । ‘वे’ आश्वस्त थे अब, आग नहीं है ! ….. कहीं नहीं है !! आदमी : गूंगा और आक्रोश : जड़ हो गया है । मगर; खुली थीं : निगाहें हैरत से —- भय से आग समा रही थी, उनमें प्रतिहिंसा की लय से ….. क्या; ... »

आज का गीत : दो पहलू

[01] आज का गीत आज का गीत, कुछ इस तरह बना ! मानो किसी बदन पर बेशुमार हुस्न संवरा शब्द : लुभावने तिल की तरह बिखर गए कागज के गुदाज़ बदन पर सौन्दर्य प्रतिमान बन कर भाव —————- आंखों का मूक आमंत्रण बने हुआ सपनों का इन्द्रधनुषी संसार घना आज का गीत, कुछ इस तरह बना……….. ………………….000………………. [02] आज का गीत कुछ इस तरह बना ... »

गीत — तुम नहीं तो ….. !

तुम नहीं, तो…… ! : अनुपम त्रिपाठी तुम नहीं; तो ग़म नहीं । ये भी क्या कुछ कम नहीं ।। तुम जो थे, तो ये भी था और वो भी था हर तरफ पसरी पड़ी रहती ……… व्यथा दर्द–—की-—-नदियां कई–बहतीं–यहां फिर भी कोरे मन में कोई संगम नहीं तुम नहीं; तो ……… कई उदास दिन ओढ़कर, काट ली हैं तनहा रातें साथ थे, तो चुप भली थी, गूंजती अब बिसरी यादें सूनी पलकों पे तने ... »

ग़ज़ल

इक समंदर यूं शीशे में ढलता गया । ज़िस्म ज़िंदा दफ़न रोज़ करता गया ॥ ख़्वाब पलकों पे ठहरा है सहमा हुआ । ‘हुस्न’ दिन-ब-दिन ख़ुद ही सँवरता गया ॥ ‘इश्क़’ है आरज़ू या कि; सौदा कोई । दिल तड़पता रहा -— दिल मचलता गया ॥ क्या हो शिक़वा कि; ‘अनुपम’ यही ज़िन्दगी । ‘ज़िंदा’ रहने की ख़ातिर ‘मैं’ मरता गया ॥ #anupamtripathi #anupamtripathiG ———- गोयाकि; ग़ज़ल है ! ———- »

उम्र की पतंगें !

कविता   उम्र की पतंगें : अनुपम त्रिपाठी   वे, बच्चे ! बड़े उल्हास से चहकते—मचलते; पतंग उड़ाते …………. अचानक थम गए !!   उदास मन लिए लौट चले घर को ———— पतंग छूट जाने से ———— डोर टू…ट जाने से   क्या, वे जान सकेंगे ? कभी कि; ———— हम भी बिखेरा करते थे, मुसकानें यूं ही : चढ़ती उम्र के; बे—पनाह जोश में .   मग... »

कविता — व्यक्ति–विशेष

बंधु ! आज स्व. राजीव गांधी की पुण्य—तिथि है। एक सपना और उसमें समाहित लालसा का स्मरण दिवस। हार्दिक श्रुद्धांजलि के साथ एक व्यक्ति — दो भाव   कविता – 01    व्यक्ति—विशेष || स्वप्न—भंग || : अनुपम त्रिपाठी तब; जबकि, एक समूची पीढ़ी निस्तेज़ कर दी गई   कोई नहीं; देख सका ……….. उन सपनों को, जो समाए थे : इक्कीसवीं सदी के लिए !   काश ! कोई तो होता !! वहीं–कही... »

‘ क्या यह सच नहीं !’

  ॥ “ यादों के जुगनू “ ॥ वह लड़की ! : न भूली होगी मुझे : न भुलाई गई मुझसे वह लड़की जानती है —- ज़िस्म की ज़द — सम्बन्धों की हद इसीलिए तो ; इक ख़ुशबू की तरह फैली है : मेरे ज़ेहन मैं और धूप की तरह ठिठकी रही : मन की मुंडेर पर कुत्सित आकांक्षाएं —– कई बार जनमीं मसल दी गईं — मन… ही… मन… में “जु…..ग…..नू “ की त…..र…..ह उसे पता है ... »

ग़ज़ल

  तेरा — मेरा इश्क पुराना लगता है । दुश्मन हमको फिर भी जमाना लगता है ॥ गुलशन – गुलशन खुशबू तेरी साँसों की । मौसम भी तेरा ही दीवाना लगता है ॥ पर्वत – पर्वत तेरा यौवन बिखरा है । हद से गुजरना कितना सुहाना लगता है ॥ इन्द्र – धनुष का बनना – बिगड़ना तेवर तेरे । मस्त निगाहों का छलका पैमाना लगता है ॥ गुजरी हयात का मैं भी इक अफ़साना हूँ । सब कहते हैं ……. मर्ज़ पुराना लगता है ॥ सांझ R... »

अ–परिभाषित सच !

॥ बेटी के लिए एक कविता ॥  “अ—परिभाषित सच !” डरते—सहमते—सकुचाते मायके से ससुराल तक की अबाध—अनिवार्य यात्रा करते हुए मैंने; गांठ बांधी पल्लू से साथ में; ढेरों आशंकाएं …………. कई; सीख—सलाइयतें ……………   हिचकियों के बीच; हिचकोले लेता मेरा अबोध मन—-आँसूओं से भीगा अपरिचित दायरों में कसमसाता रहा “ कोई अपना तलाशता रहा “ ‘अपने&... »

नाक का नक्कारख़ाना — हास्य

॥ नाक का नक़्क़ारखाना ॥ सोचिए जरा ! क्या होता, अगरचे इन्सान की नाक न होती ? सर्वप्रथम तो आधी दुनिया अंधी होती नाक न होती तो भला, चश्मा कहां पिरोती ! नाक न होती तो, ज़नाब ! सभ्रांत् महिलायें कैसे रोती ? ‘वे’ रूमाल से आंख नही……..नाक पौंछती हैं आंसुओं को गालों पर सुखाकर लिपिस्टिक को पल्लू से बचाकर अदा से नाक सुड़कती हैं-—मासूम-सी हिचकी को, बेवज़ह रोकती हैं. माननीय ब्रम्हाजी भी दो अतिरिक्त छेद... »

ग़ज़ल

वो ख़्वाब; वो ख़याल, वो अफ़साने क्या हुए । सब पूछते हैं लोग; वो दीवाने क्या हुए ॥ अपनों से जो अज़ीज़ थे आधे—अधूरे लोग । ‘पहचान’ दी जिन्होंने; वो ‘बेगाने’ क्या हुए ॥ किसने चुरा ली ‘धूप’ तुम्हारी ‘मुंडेर’ की । मिलने की वो कसक; वो पैमाने क्या हुए ॥ क्यूँ; आग निगाहों की, लग रही बुझी—बुझी । जलवा—ए—हुस्न क्या हुआ; परवाने क्या हुए ॥ दरवाज़े सारे बंद हैं; चुप के मकान के । लबरेज़ शोखियों के; वो ठिकाने क्या हुए ॥ ... »

ग़ज़ल

बंधु ! शक्ति–स्वरूपा माँ दुर्गा की आराधना के अकल्पनीय दिवस और अंतत: वैभव एवं विजय के पर्व ‘दशहरा’ पर मन–मानस में व्याप्त ‘लोभ–मोह–आघात’ के प्रतीक “रावण” का दहन । आप सभी का हार्दिक अभिनंदन एवं मंगल–कामनाएँ । गोयाकि ; ग़ज़ल है ! [A03.E004] ग़ज़ल ———–: अनुपम त्रिपाठी वो ख़्वाब में जो अक्सर दिखाई देता है । कौन है जो म... »

ग़ज़ल

2.01(63) मैं ! तुझे छू कर; ‘गु…ला…ब’ कर दूँगा ! ज़िस्म के जाम में, ख़ालिस शराब भर दूँगा !! तू; मेरे आगोश में, इक बार सही; आ तो ज़रा ! ख़ुशबू—सा बिखर जाएगी, सारा हिसाब कर दूँगा !! : अनुपम त्रिपाठी ******************************************* 011 गोयाकि ; ग़ज़ल है ! [A03.E010] ग़ज़ल———– : अनुपम त्रिपाठी और कुछ देर अभी हुस्न सजाये रखिए । नाज़ो—अंदाज़ अगर हैं तो उठाए रखिए ॥ भे... »

ग़ज़ल

ज़िंदगी को इस—–तरह से जी लिया । एक प्याला-–फिर; ज़हर का पी लिया ॥ वक़्त के सारे  ‘थ…पे…ड़े’  सह लिए । गम जो बरपा, इन लबों को सी लिया ॥ अब अगर कुन्दन—सा दीखता….मैं दमकता । ‘सूरज—मुखी’ या ‘रात—रानी’……बन गमकता ॥ छुपी हुई “अनुपम” दास्ताँ, ‘भीषण’ रण की । उम्र है : सहमी चिड़िया और वक़्त : क्रूर बहेलिया॥1.19॥ गोयाकि ; ग़ज़ल है ! [A03.01-018] ग़ज़ल —– : अनुपम त्... »

” क्या; यह सच नहीं ! “

“ यादों की यलगार “ नहीं आती याद तुम्हारी ! गोयाकि ; भूला भी नहीं मैं : तुम्हें !! मंडराती रहीं कटी पतंग-सी : तुम ! मेरे मन के आँगन मेँ : गुमसुम !! तुम्हें पाने के लिए भागता रहा : मैं मर्यादा की मुंडेर तक गिरने से बे—–ख़बर एक एक कर चुरातीं रहीं तुम —- मेरे सपने अपने सपनों मेँ घोलकर सोतीं रहीं; मीठी नींद : रात—भर “मैं ; उम्र—भर जागता रहा ……….. तृष्णा लिए भागता रहा ... »

हमारा हिंदुस्तान ….. बक़ौल; मेरा देश महान !

यह हिन्दुस्तान है ……………………………………….. कहना आसान — समझना मुश्किल — सहेजना असंभव फिर भी हमें ये गुमान है गांधी का अरमान है — सपनों का जहान है ————-मेरा देश महान है————– ……………….. क्या, यही ‘वो’ हिन्दुस्तान ह... »

मीनाकुमारी —- एक भावांजलि

***************************** “ कहते हैं ज़माने में सिला; नहीं मिलता मुहब्बत का । हमको तो मुहब्बत ने; इक हसीं दर्द दिया है ॥ “ : अनुपम त्रिपाठी ***************************** मीनकुमारी ! ……….. ये नाम ज़ेहन में आते ही आँखों के सामने हिन्दी चल—चित्रपट–फ़लक की ‘वह’ मशहूर अदाकारा साकार हो उठती है, जिसने नारी—चरित्र के वे अनूठे आयाम प्रस्तुत किए कि; नारी—मन की थाह एक पहेली सी बन गई ... »

निर्झर झरता गीत

  यह गीत धरा का धैर्य गर्व है, नील–गगन का यह गीत झरा निर्झर-सा मेरे; प्यासे मन का ….   यह गीत सु—वासित् : चंदन–वन यह गीत सु-भाषित् : जन-गण-मन यह गीत प्रकाशित् : सूर्य–बदन यह गीत गरल का आचमन यह गीत समर्पण् जीवन का यह गीत झरा…………..   यह गीत वसन् नंगे तन का यह गीत रंग अल्हड़पन का यह गीत अलाव जीवन-रण का यह गीत भीष्म के भीषण-प्रण का यह गीत व... »

बंजारा गीत

।। बंजारा – गीत ।। : अनुपम त्रिपाठी कोई ख्वाब नहीं, जो ढल जाऊॅं । मौसम की तरह से बदल जाऊॅं ॥ तबियत से हूँ ; मैं ! इक बंज़ारा । कल जाने कहां को निकल जाऊॅं ॥01॥ आया था घड़ी भर महफिल में । यादों को बसाकर इस दिल में ॥ कुछ देर ठहर कर जाना है । तुम कह लो कि; ये, दीवाना है ॥ कुछ याद तुम्हारी साथ लिये । फिर, जाने कहाँ पे मिल जाऊॅं ॥02॥ पत्थर भी कभी क्या रोया है ! ये, द्वंद कहाँ अभी सोया है ॥ मुझे ‘टू&... »

ग़ज़ल

मैं ! जटिल था ; आपने , कितना सरल-सा कर दिया । सोचता हूँ ; शुष्क हिमनद , को तरल-सा कर दिया ॥ खाली सीपों का भला , बाज़ार में क्या मोल होता ? आप ने बन बूंद–स्वाति , बेशकीमती कर दिया ॥ ये खुला–सा आसमां , मुझको डराता ही रहा । आपने आधार बन के , शामियाना कर दिया ॥ मैं ! लहर के साथ रहकर , टूटता…टकराता रहता । आपने पतवार–सा बन , धार पे अब धर दिया ॥ हौंसला था और उड़ने को , खुली परवाज़ थी... »

मैं; जड़ नहीं हूँ !

ओ; तट पर बैठे, तटस्थ लोगों ! सुनो, मेरे सन्मुख ; लक्ष्य है —- राह नहीं है मैं; धारा पर धारा—प्रवाह मुझे विराम की चाह नहीं है ॰   तुम; क्या समझे ! डूब जाऊँगा ? संघर्षों के कुरुक्षेत्र में !! धर्म—राज सा ऊब जाऊँगा ??   लेकिन; मैं गहरे पानी की पहले थाह लिया करता हूँ दारूण–दु:खों में तपा हूँ : जी भर अब; प्राप्य—सुखों को जीया करता हूँ ॰ तुम; तमाशबीन , तर्पण की ख़ातिर तट पर बैठे ऊँघ... »

ये, अंदर की बात है !

  हनीमून-टूर पर नवयुगल ने , हिल-स्टेशन के आलीशान होटल में : आनन्दपूर्वक सुहागरात मनाई बिदाई में ‘रिटर्न-गिफ़्ट’ के बतौर, होटल-प्रबंधन से एक ‘सी.डी.’ पाई . ‘वे’ बहुत खुश थे————– कि ; ‘सी.डी.’ के माध्यम से अब घर बैठे हिल-स्टेशन की सैर करेंगें ‘‘कमरे से बाहर तक नहीं निकला घोंचू ’’-इस शाश्वत् लांछन से भी बचेंगें . घर लौटकर यात्रा के सच्चे–झूठे, खट्टे–मीठे ... »

सामूहिक विवाह

सामूहिक विवाह का आयोजन था कम खर्च में–ज़्यादा निपटें यही असली प्रयोजन था चारों ओर हा….हा……..कार मचा था “ मे……………..ला ” — सा लगा था वर—वधू मंडप में सहमे से खड़े थे कुछ कानूनन ना-बालिग थे , कुछ बहुत बड़े थे सारी बस्ती प्रतीक्षा में सुलग रही थी हवनकुण्ड में पवित्र अग्नि धधक रही थी पंडितजी का मंत्रोच्चार ज़ारी था……….. : श... »

सड़क का सरोकार

।। सड़क का सरोकार ।। : अनुपम त्रिपाठी सड़कें : मीलों—की—परिधि—में बिछी होती हैं । पगडंडियां : उसी परिधि के आसपास छुपी होती हैं ॥ सड़कें : रफ्तार का प्रतीक हैं । पगडंडियां : जीवन का गीत है ॥ लोग ! सड़कों पर समानान्तर गुज़र जाते हैं । ‘‘न हैलो… न हाय !’’ पलभर में नज़र भी न आते हैं ॥ पगडंडियां : बातें करती हैं , चलती——-मचलती हैं । ‘‘ पाँव–लागी, राम–राम भैया’’... »

ठिठोली

[बुरा न मानो होली है ….. शुभकामनाओं सहित ] आया जोबना पे कैसा उभार दैया । गोरी कैसे सम्हालेगी भा…र दैया ।। पूनम के चांद–सा रूप खिला रे ! क़दरदान कोई न यार मिला रे !! छलक—छलक जाए हंसी होठों—–पे-—प्यास—बसी नैनों का निराला व्यापार दैया । गोरी कैसे सम्हालेगी भा..र दैया ।। गोरी सम्हाले रूप ; बिखर-बिखर जाए रे ! हूक उठे जियरा में -– होंठों पे हाय , रे !! भंवरे बेचैन हैं ... »

ग़ज़ल

“ हद से बढ़ जाए कभी गम तो ग़ज़ल होती है । चढ़ा लें खूब अगर हम तो ग़ज़ल होती है ॥“ इश्क़ है—रंग , हिना—हुस्न ; याद है : खूशबू । फिर भी भूले न तेरा गम तो ग़ज़ल होती है ॥ कौन परवाह किया करता है आगोश में यहाँ । याद में आँख हो पुर—नम तो ग़ज़ल होती है ॥ लब—औ’–रुखसार ……….. ‘मरमरी वो बदन । संग मिल जाएँ पेंच-औ’-खम तो ग़ज़ल होती है ॥ चुप हो धड़कन ———- जुबां खामोश मेरी । चले वो ख्... »

ढहती दीवारें

तब, जबकि कल ; बहुत छोटी थी ‘मैं’ कहा करती थी ‘माँ’ ——- ऐसा मत करो ! ——- वैसा मत करो !! : वरना लोग क्या कहेंगे ? शनै:–शनै: —– ‘मैं’ ; ‘ये लोग’ और ‘इनके’ ‘कहने का डर’ यौवन की दहलीज़ तक, साथ—साथ चले आए …………….. “घर से निकलने” और “सुरक्षित लौट आने तक” पता नहीं ‘कौन लोग’ , क्या – क्या कह जाते ? माँ ! एक आशंका से भरी रहती …̷... »

” बच्चे और सपने “

सपनों में बच्चे देखना सुखद हो सकता है ; लेकिन ; बच्चों में सपने देखना आपकी भूल है जैसे; सपने…… सिर्फ़ सपने बच्चे : साकार नहीं करते वैसे ही; बच्चों में सपने साकार करना फिजूल है. हाँ ! आप ऐसा करिए; बच्चों में सपने रोपिए शिक्षा और संस्कार कदापि न थोपिए . आपके सपने ————— चाहे जितने रंगीन हों आपकी विफलता की कहानी हैं बच्चों की उडान उनकी सफलता की निशानी हैं. आप ... »

बोल ; मेरी मछली !

जब अंधे;आपस में मिल बैठकर , : संध्या बांचते हैं कुत्ते : पत्तल चाटते हैं……….. यही तो है ; हमारी व्यवस्था ! कि; अंतिम पंक्ति का अंतिम व्यक्ति डरा–सहमा जड रह जाता है उसे धकिया कर ; हर बार एक नया पात्र सामने आता है . गुलाम मानसिकता ———- नपुंसक व्यवस्था के सम्मुख दोहरी हो के दण्डवत होती है कतार स्तब्ध है ; याचकों की ——————&#... »

सत्ता और सुन्दरी

सत्ता और सुन्दरी

सत्ता और सुन्दरी एक ही सिक्के के दो पहलू दोनों का चरित्र : दलबदलू इक- दूजे के बिना अधूरे दोनों प्रतिबध्द परस्पर पूरे आदमी के लिए ; ———– दोनों ही निहायत जरुरी दोनों का वशीकरण ————— जी — हुजूरी. दोनों के मजे हैं ; अपनी तई जुड़ी हैं दोनों से ही———– ………………बदनामियाँ कई. सत्ता का पावर ... »

संघर्ष ; शेष है !

संघर्ष ; शेष है !

किसी नदी का सिर्फ़ नदी होना ही पर्याप्त नहीं होता ॰ किसी भी नदी का जीवन बहुत लंबा नहीं होता बेशक; लंबा हो सकता है : रास्ता , न, ही ……………….. शेष रह जाता है नदी का जीवटता भरा अस्तित्व कहीं किसी महासागर में आत्म—सात हो जाने के पश्चात ॰ इसीलिए; ज़रूरी है——– हर नदी के लिए —- बनाए रखे अपनी पहचान —- जिजीविषा के प्रतिमान —- जीवन क... »

कविता — बिका हुआ खरीददार

कविता — बिका हुआ खरीददार

बेशक; तुम खरीद लोगे! ……………… बिछाओगे निचोड़ कर फेंक दोगे; मुझे : एक हिकारत के साथ….. लेकिन; फिर भी हार जाओगे ! हाँफती साँसों से यकीनन : कैसे पार पाओगे ? पीड़ा और समर्पण से गुज़रकर मुस्कुराऊंगी : मैं—-विजयी बनकर क्योंकि ; अपने दाम———– मैंने खुद तय किए हैं. »

कविता — संदर्भ हीन

तुम ! किसी दुर्दम्य वासना में क़ैद छटपटातीं रहीं जल — हीन मछली सी ……. और मैं ; तमाम वर्जनाओं में घिरा मोम–सा पिघलता रहा अनमना सुलगता रहा यक़ीनन , यह समझौता था—सम्बंध नहीं कहीं कोई प्रतिकार नहीं तनिक भी प्रतिबंध नहीं तब भी ——— जब ओढ़ती रहीं : तुम उस मर्द की देह : जिसे पति कहा गया ……….. एक अनमनी प्रक्रिया की तरह निर्लिप्त परोपकार लिए : व... »

ग़ज़ल

ग़ज़ल : अनुपम त्रिपाठी इक शख्स कभी शहर से ; पहुँचा था गाँव में । अब रास्ते सब गाँव के ; जाते हैं शहर को ।। खेत–फ़सल–मौसम ; खलिहान हैं उदास । ग़मगीन चुभे पनघट ; हर सूनी नज़र को ।। कुम्हलाने लगे ” चाँद” ये; घूंघट की ओट में । पायल से पूछें चूडियाँ ; कब आयेंगे घर ” वो ” ।। बेटा निढाल हो के ; हर रोज पूंछे माँ से । क्यूं छोड़ गया बापू ? इस गाँव को– घर को ।। गाँव... »

व्यंग्य —- पूंछ पुराण

व्यंग्य …………………………………… ****** पूंछ— पुराण (समग्र)****** कभी देखा है ;आपने , ऐसा कुत्ता ! जो ; देखने में हो छोटा–सा मगर;पूंछ उसकी लंबी हो यानि कि ; —— भली–चंगी हो. जी हाँ ! कई ऐसे कुत्ते हैं : यहाँ और बहुतायत में हैं : वे पूंछें जो;जरुरत पड़ने पर,किसी भी कुत्ते के पीछे लग जाती हैं ̷... »

ग़ज़ल

ये माना कि ; मैं तेरा ख्बाब नहीं हूँ । मगर फिर भी ; इतना ख़राब नहीं हूँ ।। नशे–सा मैं; चढ़ता–उतरता नहीं । सुराही सब्र की हूँ ; शराब नहीं हूँ ।। मुझे पता है कि ; तू ! भुला न पायेगी । सुलगता सवाल हूँ—- जवाब नहीं हूँ ।। रुबरू रुह होगी मेरी; तुझसे तो ये पढ़ना। नंगा सच हूँ ——सस्ती किताब नहीं हूँ ।। मैं खुशबू हूँ–हिना हूँ; याद–ए-सफीना हूँ । नहीं हूँ तो रिश्तों क... »

ग़ज़ल

फिर वही अफ़रा– तफ़री; उच्च—स्तरीय मीटिंग । गूंगे–बहरे–लाचारों की; देश के साथ :  चीटिंग ।। फिर कोरी धमकी की भाषा; रोज़ नया खु….. ला…..सा। फिर से मुर्दा चेहरे चमके; देते खूब दि….ला…..सा।। फिर बूढों के अस्तबल में; हुई थोड़ी सी : हलचल। फिर सदमे में : सरहद; माँ का लहूलुहान है : आँचल।। आज बिलखते वे ही जिनने; इस नासूर को पाला है। आज चींखते वे ही जिनके; दामन... »

” किस्सा–कुर्सी — का “

व्यंग्य गीत ———– अनुपम त्रिपाठी ” किस्सा–कुर्सी — का ” बचपन में किस्सों में कुर्सियों की बातें सुनते थे।आजकल कुर्सियों के किस्से आम हैं । लेकिन ये कुर्सियाँ मिलती कैसे हैं ? इस लोकतंत्र की महती विडम्बना भी यही है कि ; कुर्सी सेवा पर हावी है। बेशक ; लोकतंत्र जीवित है ——– जीवन्त नहीं बना पाए हम इसे । क्या अपने वर्तमान — अपने इति... »

हास्य कविता — सन्नाटे की गूँज

(हर पति की ओर से अपनी पत्नी के प्रति शाश्वत भावना एवं हर पत्नी की अपने पति के प्रति सारस्वत भावना को समर्पित् हास्य — रचना ) आखिरकार ईश्वर ने हमारी सुन ही ली आज सुबह-सबेरे ही पत्नी बोली ——- “ऐ; जी! सुनो , मैं तो मायके चली यहां तो तंग आगई हूं कुछ दिन चैन से रहूँगी : हद होती है; यार ! ………. कब तक सहूँगी “. खुली जेल में ; यह पहली आजादी की बयार थी दोपहर त... »

गुस्ताखी माफ़ !

गुस्ताखी माफ़ ! बच्चों के प्रश्न भी अज़ीब होते हैं ! मगर ; सच्चाई के कितने क़रीब होते हैं !! कल ही आधुनिक–भारत का सच पढ़ते हुए , प्रत्यक्ष – से , परोक्ष – रूप में लड़ते हुए , मेरे बेटे ने मुझे पूछा ——————- ‘‘ पापा ! कानून की आंखों पर पट्टी क्यों बंधी होती है ? क्या, न्याय—-प्रक्रिया वास्तव में अंधी होती है ?? ’’ ‘‘ हे, ईश्वर ! यह प्रश्न था या ... »

मित्र कौन !

  सच्चा मित्र —— होता है : संघरित्र ! आपसे जुड़कर—आपका विषाद बाँटता है आपकी ऊष्मा आत्मसात् करता है ……….. आपको ऊर्जा से भरता है. सच्चे मित्र के मुँह पर ; ऊगते हैं : बबूल ! वह गुलाब–सा ललचा कर लहू——-लुहान नहीं करता : अनचाहे–अनजाने काँटे नहीं चुभाता आपकी परछाई होता है……………….. ………R... »

“ धूप की नदी “

लड़की ; पड़ी है : पसरी निगाहों के मरुस्थल में ………….धूप की नदी सी । लड़की का निर्वस्त्र शरीर सोने—सा चमकता है लोलुप निगाहों में शूल—सा चुभता है । मगर , वह बे—खबर है पसरी पड़ी है धूप की नदी सी ……… निगाहों के मरुस्थल में । देह की रण—भूमि पर विचारों के कुत्सित—शस्त्र मर्यादा का ख़ून कर गूँथ गए भूलकर लड़की का बे—बस पिता हाथ जोड़े तक रहा : एक और जलती चिता । लड़की ; तनिक... »

“ सच का साक्षात्कार “

कल अनायास मिला राह में दीन – हीन ; कातर याचक—सा खड़ा : सच उसने आवाज़ लगाई — “ मुझे रास्ता बताओ ….. भाई ! “ सच एक सुगंध की तरह फैलता है : ज़ेहन में और ; मसल देते हैं …….. लोग भावनाओं को ————– जुगनुओं की तरह — “ जाने कब से भटक रहा ; बेचारा !” मैंने सोचा , ……… साथ ले आया लोग कतराने लगे ………………... »