Anupam Tripathi, Author at Saavan's Posts

आग कहाँ नहीं होती !

( संदर्भ आपातकाल ) ‘वे’ चंद लोग थे जो, आए और ज़ब्त करने लगे आग के संभावित ठिकाने । —– रौशनी गुल कर दी —– चूल्हे ठंडे और, माचिस गीली । : सख़्त पाबंदी थी सूरज पर भी न ऊगने की । ‘वे’ आश्वस्त थे अब, आग नहीं है ! ….. कहीं नहीं है !! आदमी : गूंगा और आक्रोश : जड़ हो गया है । मगर; खुली थीं : निगाहें हैरत से —- भय से आग समा रही थी, उनमें प्रतिहिंसा की लय से ….. क्या; ... »

आज का गीत : दो पहलू

[01] आज का गीत आज का गीत, कुछ इस तरह बना ! मानो किसी बदन पर बेशुमार हुस्न संवरा शब्द : लुभावने तिल की तरह बिखर गए कागज के गुदाज़ बदन पर सौन्दर्य प्रतिमान बन कर भाव —————- आंखों का मूक आमंत्रण बने हुआ सपनों का इन्द्रधनुषी संसार घना आज का गीत, कुछ इस तरह बना……….. ………………….000………………. [02] आज का गीत कुछ इस तरह बना ... »

गीत — तुम नहीं तो ….. !

तुम नहीं, तो…… ! : अनुपम त्रिपाठी तुम नहीं; तो ग़म नहीं । ये भी क्या कुछ कम नहीं ।। तुम जो थे, तो ये भी था और वो भी था हर तरफ पसरी पड़ी रहती ……… व्यथा दर्द–—की-—-नदियां कई–बहतीं–यहां फिर भी कोरे मन में कोई संगम नहीं तुम नहीं; तो ……… कई उदास दिन ओढ़कर, काट ली हैं तनहा रातें साथ थे, तो चुप भली थी, गूंजती अब बिसरी यादें सूनी पलकों पे तने ... »

ग़ज़ल

इक समंदर यूं शीशे में ढलता गया । ज़िस्म ज़िंदा दफ़न रोज़ करता गया ॥ ख़्वाब पलकों पे ठहरा है सहमा हुआ । ‘हुस्न’ दिन-ब-दिन ख़ुद ही सँवरता गया ॥ ‘इश्क़’ है आरज़ू या कि; सौदा कोई । दिल तड़पता रहा -— दिल मचलता गया ॥ क्या हो शिक़वा कि; ‘अनुपम’ यही ज़िन्दगी । ‘ज़िंदा’ रहने की ख़ातिर ‘मैं’ मरता गया ॥ #anupamtripathi #anupamtripathiG ———- गोयाकि; ग़ज़ल है ! ———- »

उम्र की पतंगें !

कविता   उम्र की पतंगें : अनुपम त्रिपाठी   वे, बच्चे ! बड़े उल्हास से चहकते—मचलते; पतंग उड़ाते …………. अचानक थम गए !!   उदास मन लिए लौट चले घर को ———— पतंग छूट जाने से ———— डोर टू…ट जाने से   क्या, वे जान सकेंगे ? कभी कि; ———— हम भी बिखेरा करते थे, मुसकानें यूं ही : चढ़ती उम्र के; बे—पनाह जोश में .   मग... »

कविता — व्यक्ति–विशेष

बंधु ! आज स्व. राजीव गांधी की पुण्य—तिथि है। एक सपना और उसमें समाहित लालसा का स्मरण दिवस। हार्दिक श्रुद्धांजलि के साथ एक व्यक्ति — दो भाव   कविता – 01    व्यक्ति—विशेष || स्वप्न—भंग || : अनुपम त्रिपाठी तब; जबकि, एक समूची पीढ़ी निस्तेज़ कर दी गई   कोई नहीं; देख सका ……….. उन सपनों को, जो समाए थे : इक्कीसवीं सदी के लिए !   काश ! कोई तो होता !! वहीं–कही... »

‘ क्या यह सच नहीं !’

  ॥ “ यादों के जुगनू “ ॥ वह लड़की ! : न भूली होगी मुझे : न भुलाई गई मुझसे वह लड़की जानती है —- ज़िस्म की ज़द — सम्बन्धों की हद इसीलिए तो ; इक ख़ुशबू की तरह फैली है : मेरे ज़ेहन मैं और धूप की तरह ठिठकी रही : मन की मुंडेर पर कुत्सित आकांक्षाएं —– कई बार जनमीं मसल दी गईं — मन… ही… मन… में “जु…..ग…..नू “ की त…..र…..ह उसे पता है ... »

ग़ज़ल

  तेरा — मेरा इश्क पुराना लगता है । दुश्मन हमको फिर भी जमाना लगता है ॥ गुलशन – गुलशन खुशबू तेरी साँसों की । मौसम भी तेरा ही दीवाना लगता है ॥ पर्वत – पर्वत तेरा यौवन बिखरा है । हद से गुजरना कितना सुहाना लगता है ॥ इन्द्र – धनुष का बनना – बिगड़ना तेवर तेरे । मस्त निगाहों का छलका पैमाना लगता है ॥ गुजरी हयात का मैं भी इक अफ़साना हूँ । सब कहते हैं ……. मर्ज़ पुराना लगता है ॥ सांझ R... »

अ–परिभाषित सच !

॥ बेटी के लिए एक कविता ॥  “अ—परिभाषित सच !” डरते—सहमते—सकुचाते मायके से ससुराल तक की अबाध—अनिवार्य यात्रा करते हुए मैंने; गांठ बांधी पल्लू से साथ में; ढेरों आशंकाएं …………. कई; सीख—सलाइयतें ……………   हिचकियों के बीच; हिचकोले लेता मेरा अबोध मन—-आँसूओं से भीगा अपरिचित दायरों में कसमसाता रहा “ कोई अपना तलाशता रहा “ ‘अपने&... »

नाक का नक्कारख़ाना — हास्य

॥ नाक का नक़्क़ारखाना ॥ सोचिए जरा ! क्या होता, अगरचे इन्सान की नाक न होती ? सर्वप्रथम तो आधी दुनिया अंधी होती नाक न होती तो भला, चश्मा कहां पिरोती ! नाक न होती तो, ज़नाब ! सभ्रांत् महिलायें कैसे रोती ? ‘वे’ रूमाल से आंख नही……..नाक पौंछती हैं आंसुओं को गालों पर सुखाकर लिपिस्टिक को पल्लू से बचाकर अदा से नाक सुड़कती हैं-—मासूम-सी हिचकी को, बेवज़ह रोकती हैं. माननीय ब्रम्हाजी भी दो अतिरिक्त छेद... »

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